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भीलवाड़ा

संत राजनीति का ज्ञान रखें, लेकिन समाज में राजनीति नहीं करें

भीलवाड़ा. पुरुषोतम मर्यादा राजा राम से लेकर वर्तमान काल में सम्राट अशोक, सम्राट हर्ष जितने भी अच्छे शासक हुए वे सब धर्म गुरुओं की राय पर चले। वर्तमानBhilwara, Bhilwara, Rajasthan, India शासन में धर्म गुरु गौण हैं।

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भीलवाड़ा. पुरुषोतम मर्यादा राजा राम से लेकर वर्तमान काल में सम्राट अशोक, सम्राट हर्ष जितने भी अच्छे शासक हुए वे सब धर्म गुरुओं की राय पर चले। वर्तमान शासन में धर्म गुरु गौण हैं। समाज में नैतिकता समाप्त होकर व्याभिचार, अनाचार, हिंसा और लूटमार की घटनाएं बढ़ी है। इनसे बचना है तो धर्म गुरुओं का सानिध्य आवश्यक है। हर समाज भारतीय संस्कृति को खो रहा है। ये बात जैन मुनि आदित्य सागर ने पत्रिका से विशेष बातचीत में शुक्रवार को कहीं। मुनि आदित्य सागर से बातचीत के अंश।


सवाल: संतों को राजनीति में जाना चाहिए
जवाब: संत व धर्मगुरु को राजनीति का ज्ञान रखना चाहिए। राजनीति करनी नहीं चाहिए। राजनीति करते हैं तो संत नहीं। नीति की बात करें तो संत के पास नीति व धर्म नीति भी होनी चाहिए। संत को राजनीति, षड़यंत्र व कूटनीति का ज्ञान होना चाहिए। इनका प्रयोग समाज की रक्षा के लिए होना चाहिए। धर्मगुरु चाहे किसी भी धर्म के हो, समाज के सच्चे एवं अच्छे मार्गदर्शक बनें।
सवाल: युवा वर्ग धर्म से अलग हो रहा
जवाब: भारत में युवा शक्ति का अनुपात अन्य देशों के मुकाबले अधिक है। युवा देश के विकास को चरम शिखर पर पहुंचाएंगे। उनको सही मार्गदर्शन की जरूरत है। देश के युवा को भौतिकता की चकाचौंध ने दिग्भ्रमित कर दिया। भौतिक साधनों एवं सुखों के पीछे दौडने से धर्म से दूर हो रहे। पीढ़ियों से धर्म के प्रति चली आ रही आस्था कहीं न कहीं मौजूद है। इसी कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करोडों की नौकरी छोड़ युवा वैराग्य पथ पर चल रहे है।
सवाल: जैन धर्म में तो आलू-प्याज के त्याग, लेकिन युवा अभक्ष्य हो रहे
जवाब: जैन समाज में जमीकंद, आलू-प्याज का त्याग है, यह सही है। लेकिन समाज में भी भोजन की पवित्रता कुछ हद तक खत्म हुई है। जैन सिद्धान्तों के अनुसार जमीकंद खाना, रात्रि भोजन करना पाप है। जैन ही नहीं हिन्दू समाज को शाकाहारी बनाना चाहिए। प्रत्यक्ष रूप से जैन व हिन्दू अभक्ष्य नही खाता, लेकिन फास्टफूड में कई तरह की अभक्ष्य इनग्रेडिएन्ट मिलाएं जाते हैं। जैन मुनि इसके बारे में युवाओं उनकी भाषा में समझाते हैं तो उनको समझ में आ रहा। परिवर्तन धीरे-धीरे होता है, जबरदस्ती नहीं की जा सकती।
सवाल: समाज के लिए क्या संदेश है
जवाब: आज समाज में एकता बहुत आवश्यक है। एक दूसरे के प्रति सद्भावना भी समाप्त हो गई है। अपने आप को पंथ, परम्परा,, संतों में या अन्य विकल्पों में नहीं बांट कर एकता के प्रतीक दे। इसी से धर्म का पूर्ण स्थापन सकता है।