
MP High Court- सांकेतिक इमेज
राजस्थान के जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों के प्रबंधन और चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। अदालत ने डेयरी संघों के संचालक मंडल का चुनाव लड़ने के लिए तय की गई सख्त योग्यताओं को पूरी तरह वैध माना है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब राजस्थान में डेयरी संघों के चुनाव में केवल वे ही समितियां और उनके अध्यक्ष ताल ठोक सकेंगे, जिन्होंने साल में कम से कम 270 दिन संघ को दूध की आपूर्ति की हो और जिनकी ऑडिट ग्रेडिंग बेहतर हो।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के 18 मई 2022 के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें इन उप-नियमों को असंवैधानिक और कानून की नजर में शून्य घोषित कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने रामचंद्र चौधरी व अन्य की अपील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि सहकारिता के ढांचे को मजबूत बनाने के लिए केवल सक्रिय और प्रदर्शन करने वाले सदस्यों को ही प्रबंधन का जिम्मा मिलना चाहिए। इस फैसले से भाजपा को बड़ा झटका लगा है।
कोर्ट ने कहा कि वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार अलग-अलग है। इनमें से कोई भी मौलिक अधिकार नहीं है। ये दोनों वैधानिक अधिकार हैं। चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शर्तें तय करना किसी सदस्य को दुर्भावना से अयोग्य घोषित करना नहीं है। नियम 28 के तहत अयोग्यता अलग है, लेकिन चुनाव मैदान में उतरने के लिए न्यूनतम भागीदारी जैसे- 270 दिन दूध सप्लाई और न्यूनतम मात्रा तय करना पूरी तरह से डेयरी संघ के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से कहा कि हाईकोर्ट ने जिन डेयरी संघों के नियम रद्द किए, उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया। प्रदेश के डेयरी संघों पर असर डालने वाला फैसला बिना प्रभावित पक्षों को सुने दे दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करना भी गलत था, क्योंकि राजस्थान सहकारी समिति अधिनियम-2001 में चुनाव विवादों के निपटारे के लिए रजिस्ट्रार स्तर पर प्रभावी वैधानिक व्यवस्था है।
Updated on:
14 Apr 2026 08:58 am
Published on:
14 Apr 2026 08:58 am
