भीलवाड़ा में खनन क्षेत्र बांट रहा सिलिकोसिस रोग
भीलवाड़ा. प्रदेश में 31, 827 ऐसे खनन श्रमिक हैं, जो सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। भीलवाड़ा जिले में लगभग 1240 मरीज इससे ग्रस्त हैं। जिले में इस बीमारी की जांच कराने वाले 7,750 श्रमिक थे। प्रदेश में सर्वाधिक सिलिकोसिस रोगी जोधपुर में 7473, करौली में 4253 तथा सिरोही में 3163 हैं।
प्रदेश में सिलिकोसिस के इलाज व सहायता के लिए 1 लाख 92 हजार 151 जनों में आवेदन किया। इनमें 1 लाख 64 हजार 98 आवेदन निरस्त कर दिए गए। 31,827 को रोगी मानकर उपचार किया जा रहा है। इनमें से 26,549 लोग और उनके परिजनों को सहायता राशि मुहैया कराई गई है। खनन क्षेत्र के मजदूरों के सांस में तकलीफ और फेफड़ों में हल्का दर्द होते ही सिलिकोसिस की आशंका है।
तीन डॉक्टरों की टीम
बोर्ड में तीन डॉक्टरों की टीम होती है। इसमें रेडियोलॉजिस्ट, चेस्ट एवं टीबी तथा मेडिसिन का डॉक्टर बैठता है। यह डॉक्टर मरीज की एक्स-रे रिपोर्टं के आधार पर ही आवेदक को सिलिकोसिस होने या ना होने का प्रमाण पत्र देते है। आवश्यकता होने पर सीटी स्केन एवं एमआरआई की जांच कराते हैं। इनके आधार पर आवेदक को सिलिकोसिस का प्रमाण पत्र देना है या नहीं, यह कमेटी तय करती है।
क्यों होता है रोग
सिलिका कणों और टूटे पत्थरों की धूल की वजह से सिलिकोसिस होती है। धूल सांस के साथ फेफड़ों तक जाती है। धीरे-धीरे यह बीमारी पांव जमाती है। यह खासकर पत्थर के खनन, रेत-बालू के खनन, पत्थर तोड़ने के क्रेशर, पत्थर को काटने और रगड़ने जैसे उद्योगों के मजदूरों में पाई जाती है।
जागरुकता की जरूरत
सिलिकोसिस लाइलाज बीमारी है। इसे केवल जागरूकता से रोका जा सकता है। सिलिकोसिस प्रभावित लोगों का पूरा परिवार प्रभावित होता है। जिले में करीब 1240 रोगी हैं।
डॉ. प्रदीप कटारिया क्षय रोग विशेषज्ञ भीलवाड़ा