
भिण्ड के पेड़े को नहीं मिलेगा जीआई टैग, कारोबारी नहीं साबित कर पाए प्रमाणिकता
भिण्ड. हर जिले से एक विशिष्ट उत्पाद को जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) दिलाने का सरकारी प्रयास भिण्ड के पेड़े के मामले में असफल साबित हो गया। मुरैना जिले से गजक के लिए भी साथ में ही प्रयास शुरू हुए थे, लेकिन गजक को मुरैना के नाम से जीआई टैग मिल चुका है, वहीं भिण्ड में सारी कवायद निरर्थक साबित हो गई है। अधिकारियों और व्यापारियों को अब ऐसा कोई उत्पाद दिखाई नहीं दे रहा है, जिसके लिए जीआई टैग का दावा किया जा सके।
चार साल पहले हर जिले से एक विशिष्ट पहचान वाले उत्पाद को जीआई टैग दिलाने की कवायद शुरू हुई थी। इसमें भिण्ड के पेड़े को शामिल किया गया था। लेकिन यहां के कारोबारी इसकी उत्पत्ति के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी सरकार को उपलब्ध नहीं करवा पाए, इसलिए इस दावे को बल नहीं मिला। जबकि भिण्ड का पेड़ा न केवल संभाग बल्कि पूरे प्रदेश, देश और विदेशों तक मशहूर है। बाहर रहने वाले लोग जब भी भिण्ड के बारे में सुनते हैं तो यहां के पेड़े पर चर्चा जरूर करते हैं और आने-जाने पर वे इसे खरीदकर भी ले जाते हैं, लोग भी अपने परिचतों, मित्रों और रिश्तेदारों को भिण्ड का पेड़ा भेंट करने में अच्छा महसूस करते हैं। इसलिए सरकार ने चार साल पहले भिण्ड के पेड़े को जीआई टैग दिलाने की घोषणा की थी। लेकिन स्थानीय स्तर से अपेक्षित जानकारी सरकार को उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी।
किसी भी उत्पादा को भारत सरकार की ओर से जीआई टैग (भौगोलिक पहचान) भारत सरकार का वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय देता है। भारत में यह उपलब्धि वर्ष 2004-05 में दार्जिङ्क्षलग की चाय को दिया जा चुका है। भारत में करीब 432 उत्पादों को जीआई टैग दिया जा चुका है। इस मामले में कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, केरल और महाराष्ट्र राज्य आगे हैं।
जीआई टैग से यह होता है फायदा
किसी जिले या राज्य के उत्पाद को जीआई टैग मिलने पर उसे अद्वितीय का तमगा मिल जाता है। इसके आधार उसकी प्रसिद्धि के प्रयास किए जाते हैं और इसका व्यापारिक लाभ भी होता है। सरकार भी इसकी ब्रांङ्क्षडग में सहयोग करती है और उसके संरक्षण का प्रयास होता है। संरक्षण के साथ ही इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है।
पेड़े को जीआई टैग मिल जाता तो इसकी अपनी विशिष्ट पहचान पूरे विश्व में प्रमाणिक तौर पर होती। अब ऐसा कोई उत्पाद समझ में नहीं आ रहा, जिसके लिए दावा किया जा सके।
प्रदीप जैन गुड्डा, मिष्ठान व्यवसायी, भिण्ड
पेड़े को जीआई टैग मिल जाता तो इसकी ब्रांङ्क्षडग और विशेष पहचान पूरे विश्व में बनाने में मदद मिलती, इसका शहरवासियों को व्यापारिक लाभ भी मिलता।
भूपेंद्र जैन, व्यवसायी, भिण्ड
&भिण्ड के पेड़े को जीआई टैग दिलाने की जो कवायद शुरू हुई थी वह सफल नहीं हो सकी। स्थानीय व्यापारी ऐसा कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं दे सके, जिससे यह सिद्ध हो कि पेड़े की शुरूआत भिण्ड से हुई है। अब देखते हैं नए उत्पाद में कोई विकल्प मिल जाए।
बीएल मरकाम, महाप्रबंधक, जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र, भिण्ड।
Published on:
19 Apr 2023 05:24 pm
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