
सरकारी खरीद केंद्रों पर श्रमिकों का टोटा, किसान उपज तौलने को मजबूर
भिण्डसमर्थन मूल्य पर सरसों की खरीद में तुलाई की प्रक्रिया सुस्त होने से किसानों को व्यावाहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। एक केंद्र पर किसानों को चार से पांच दिन तक रुकना पड़ रहा है। इस दौरान किसानों को आर्थिक समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है। इसकी वास्तविक वजह इस बार श्रमिक उपलब्ध न होना बताया जा रहा है।
सहकारी संस्था चरथर के लिए खरीद केंद्र केंद्रीय वेयर हाउस आईटीआई परिसर में बनाया गया था। जबकि अटेर के सहकारी संस्था भीमपुरा, सकराया एवं अन्य क्षेत्रों के लिए खरीद की व्यवस्था दीनपुरा के पास लक्ष्मी वेयरहाउ में थी। यहां कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने दो दिन पूर्व निरीक्षण किया तो तमाम खामियां मिलीं, जिससे केंद्र बदलकर सेंट्रल वेयरहाउस आईटीआई परिसर कर दिया गया है। लेकिन यहां आने के बाद भी किसानों की समस्या दूर नहीं हुई है। किसानों को चार-पांच दिन तक तुलाई के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि वे भाड़े पर ट्रैक्टर ट्रॉली लेकर आते हैं।
एक दिन का भाड़ा दो से ढाई हजार रुपए तक होता है। रात रुकने पर प्रति रात 500 रुपए अतिरिक्त देना पड़ता है। इस स्थिति में किसानों को पांच दिन रुकने पर 4500-5000 रुपए भाड़ा देना पड़ रहा है। इसके बावजूद तौल के लिए श्रमिक उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। जब श्रमिकों की समस्या आती है तो कई किसान स्वयं तौल के लिए बोरे भरने, कांटे पर रखने आदि कार्यों में मदद कर रहे हैं। इसके बावजूद तीन से पांच दिन तक किसानों को खरीद केंद्र पर पड़ रहना पड़ रहा है। यही वजह है कि यहां अब तक महज 70 हजार ङ्क्षक्वटल ही सरसों की खरीद हो पाई है।
बिहार के श्रमिक नहीं आए इसलिए समस्या
खरीद व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों का दावा है कि इस बार खरीद केंद्र कम होने के बावजूद श्रमिकों की समस्या आ रही है। इसकी वजह स्थानीय श्रमिकों के मन लगाकर काम न करना बताया जाता है। देर से आना और जल्दी चले जाने की भी समस्या है। श्रमिकों की समस्या एक 10 दिन पूर्व सेवा सहकारी संस्था जवासा के लिए निर्धारित गढ़ूपुरा वेयरहाउस स्थित खरीद केंद्र पर भी आई थी। बाद में अधिकारियों ने व्यवस्था बनवाई। अब फिर से यही समस्या आ रही है। अधिकारियों का कहना है कि हर साल बिहार के श्रमिक आ जाते थे। वे खरीद केंद्र पर ही रात्रि विश्राम करते थे और सुबह जल्दी काम पर लग जाते थे। अब ऐसा नहीं हो पा रहा है और श्रमिक भी कम पड़ रहे हैं, इसलिए व्यावहारिक समस्या आ जाती है।
Published on:
11 May 2023 05:37 pm
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