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जैन धर्म से श्रुत पंचमी का 1863 साल पुराना नाता

जम्बूस्वामी मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई वे 38 वर्ष तक केवलज्ञानी होकर धर्म की देशना देते रहे। इसके बाद मुनिराज विष्णुमित्र, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन, भद्रबाहु नामक आचार्य हुए। इस प्रकार सालों तक श्रुति ज्ञान परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रही। श्रुत यानि सुनना, अभी तक गुरु के द्वारा शिष्यगण सुनते रहे, लिखने की परम्परा नहीं थी पर स्मृतिज्ञान की क्षीणता होने से आचार्य धरसेन स्वामी को परस्पर वैचारिक मान्यताएं नजर आई तब उन्हें श्रुत की सुरक्षा की चिंता हुई।

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भिंड

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rishi jaiswal

May 26, 2020

जैन धर्म से श्रुत पंचमी का 1863 साल पुराना नाता

जैन धर्म से श्रुत पंचमी का 1863 साल पुराना नाता

भिण्ड. चैत्यालय जैन मंदिर में विराजमान गणाचार्य विराग सागर ने श्रुत पंचमी की पूर्व संध्या पर कहा श्रुत पंचमी और जैन धर्म का १८६३ साल पुराना नाता है। उन्होंने बताया कि भगवान महावीर स्वामी लगभग 29 वर्ष, 5 माह, 20 दिन तक केवलज्ञानी के रूप में भारत भूमि पर धर्म की गंगा प्रवाहित करते रहे। उन्हें कार्तिक कृष्ण अमावस्या को मोक्ष की प्राप्ति हुई तथा शाम को उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। 12 वर्ष के बाद उन्हें मोक्ष तथा सुधर्माचार्य को केवलज्ञान हुआ। 12 वर्ष बाद उन्हें भी मोक्ष हुआ।

इसके बाद जम्बूस्वामी मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई वे 38 वर्ष तक केवलज्ञानी होकर धर्म की देशना देते रहे। इसके बाद मुनिराज विष्णुमित्र, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन, भद्रबाहु नामक आचार्य हुए। इस प्रकार सालों तक श्रुति ज्ञान परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रही। श्रुत यानि सुनना, अभी तक गुरु के द्वारा शिष्यगण सुनते रहे, लिखने की परम्परा नहीं थी पर स्मृतिज्ञान की क्षीणता होने से आचार्य धरसेन स्वामी को परस्पर वैचारिक मान्यताएं नजर आई तब उन्हें श्रुत की सुरक्षा की चिंता हुई। उन्होंने 2 शिष्यों को श्रुत तलेखन हेतु बुलाया। जब वे विहार करके जूनागढ़ पहुंचने वाले थे तभी गिरनार की गुफा में स्थित आचार्य धरसेन को भी स्वप्न दिखा कि 2 गोवत्सों ने आकर उन्हें सिर झुकाया है।

दोनों ने आकर आचार्य धरसेन से बुलाने का प्रयोजन पूछा तब धरसेनाचार्य ने दोनों को 1-1 मंत्र साधना सिद्धि के लिए दिया। मंत्र सिद्ध हुआ पर देवों की एक आंख हीन तथा अधिक दंतावलि देख वे समझ गए। उन्होंने सही करके पुन: सिद्ध किया तब संयोगपाग देवता प्रकट हुए। शिष्यों को परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए शिक्षा प्रदान की। दोनों शिष्यों ने अध्ययन व विहार कर सर्वप्रथम षट्खण्डागम नामक ग्रंथ लिखा जिसे महाराष्ट्र के अंकलेश्वर तीर्थक्षेत्र पर ज्येष्ठा शुक्ला पंचमी के दिन पूर्ण किया था। वहां के राजा को सौंप दिया था तब राजा ने इस ग्रंथ को चांदी के रथ में निकालकर बड़ा हर्ष उत्साह मनाया था तभी से हम सभी यह पर्व आज तक मनाते आ रहे हैं।