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यहां तोप की गूंज सुनकर खोला जाता है रोजा, 30 गांव तक जाती है आवाज

दरअसल, इस परंपरा की शुरुआत 18वीं में सदी हुई थी। इस परंपरा को भोपाल की बेगमों ने शुरु किया था।

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Nitesh Tiwari

Jun 12, 2016

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भोपाल। रायसेन, मध्य प्रदेश का एक ऐसा जिला जहां रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के लोग तोप की आवाज सुनकर रोजा खोलते हैं। किले की पहाड़ी से ये तोप चलाया जाता है जिसकी परंपरा करीब 200 साल से चली आ रही है। कहते हैं इस तोप आवाज करीब 30 गावों तक सुनाई देती है। ख़ास बात यह भी है कि इस तोप को सालों से एक ही परिवार चलाता आ रहा है।

इस जिले में रमजान के दौरान सेहरी और अफ्तारी की सूचना देने के लिए तोप चलाए जाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस काम को दो लोगों ने अपने जिम्मे ले रखा है जिनमें से एक पप्पू भाई और दूसरे सईद खां हैं जो रोजाना तोप चलाकर रोजे खोलने की सूचना देते हैं।

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सुबह-शाम लगता है 1 किग्रा बारूद
पप्पू के अनुसार एक बार गोला दागने में करीब 500 ग्राम बारूद लगता है इस तरह सुबह शाम मिलाकर एक किलो बारूद खर्च होता है। पप्पू बताते हैं उन्हें इस काम में काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। इसके लिए उन्हें टीन वाली मस्जिद से तय वक़्त पर लाइट का इशारा मिलता है और वे तोप से गोला दाग देते हैं।

प्रशासन देता है एक महीने का लाइसेंस
इस काम के लिए प्रशासन की ओर से एक महीने का लाइसेंस भी जारी किया जाता है। जब रमजान समाप्त हो जाता है तो ईद के बाद तोप की साफ-सफाई की जाती है और उसे सरकारी गोदाम में जमा कर दिया जाता है। इस काम को लेकर पप्पू खां का कहना है कि उनका परिवार ही सालों से तोप चलाता आ रहा है। वह खुद 15 साल से तोप चला रहे हैं। इसके लिए आधे घंटे पहले तैयारी करना पड़ती है, तब सही वक़्त पर तोप चल पाती है। चुकी रमजान में समय का बड़ा महत्व है, इसलिए इस चीज की तयारी पहले से ही की जाती है।

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सेहरी के लिए बजता है नगाड़ा
-सुबह के वक़्त सेहरी की सूचना देने के लिए 2 घंटे पहले नगाड़े बजाए जाते हैं ताकि रोजेदार जग जाएं।
-नगाड़े बजाने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है।
-शहर का वंशकार परिवार इस काम को संभाले हुए है।
-नगाड़े किले की प्राचीर से बजाए जाते हैं।
-इससे इनकी आवाज मीलों दूर तक सुनाई देती है।
दरअसल, इस परंपरा की शुरुआत 18वीं में सदी हुई थी। इस परंपरा को भोपाल की बेगमों ने शुरु किया था।


यहां कव्वाली गाते हुए सेहरी से पहले जगाते हैं रोजेदारों को
इंदौर में रमजान माह में अल्लाह की खिदमत का सवाब अजीम होता है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो तड़के ही इस काम में जुट जाते हैं। यह युवा-बुजुर्गों और फेरी वालों के छोटे-छोटे समूह हैं, जो घर-घर जाकर आवाज लगाते हैं 'जागो अल्लाह के प्यारों, सेहरी का वक्त हो गया है'। मटके और तबले लिए लोग घरों पर दस्तक देते हैं। बंबई बाजार, खजराना, कटकटपुरा, आजाद नगर, कागदीपुरा, पिंजारा बाखल में यह नजारा आम होता है।


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