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गजल गायक हुसैन बंधुओं ने कहा: हम दोनों भाइयों का रिश्ता खून का ही नहीं सुरों का रिश्ता भी है

होमगार्ड मुख्यालय में हुसैन बंधुओं का गायन

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श्रोताओं को मौसिकी के रंग में रंगते हुए उन्होंने सुप्रसिद्ध गजल एलबम 'गुलदस्ता' का 'मैं हवा हूं कहां वतन मेरा' सुनाकर माहौल को सुरमयी कर दिया।

भोपाल। गजल और कव्वाली गायक हुसैन बंधू के नाम से मशहूर अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन ने शुक्रवार को होमगार्ड मुख्यालय में प्रस्तुति दी। उन्होंने कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से की। इसके बाद उन्होंने अपनी पॉपुलर गजल 'चल मेरे साथी चल' गाकर शाम का मिजाज ही बदल दिया। श्रोताओं को मौसिकी के रंग में रंगते हुए उन्होंने सुप्रसिद्ध गजल एलबम 'गुलदस्ता' का 'मैं हवा हूं कहां वतन मेरा' सुनाकर माहौल को सुरमयी कर दिया। इसके बाद दौरान उन्होंने गजल 'नज़र मुझसे' भी सुनाई।

चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में शुरू किया था करियर
उन्होंने कहा कि पिता उस्ताद अफजल हुसैन से हमने संगीत की तालिम ली। इसके बाद 1959 में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में आकाशवाणी, जयपुर से सफर शुरू किया। पिताजी हमेशा कहते थे कि दोनों भाई एक-दूसरे की ताकत बनकर साथ काम करो। हमारा यह रिश्ता एक खून, एक खयालात और एक सुर का रिश्ता है। उन्होंने कहा कि संगीत अपनी जगह खुद बना लेता है, जमाना बदला है तो संगीत पेश करने का तरीका भी बदलेगी ही, जैसे मौसम, खयालात, दिमाग व हालात सब बदल जाते हैं तो संगीत भी बदलता है। पॉप, इंडीपॉप, रीमिक्स कोई भी संगीत खराब नहीं है। हालांकि, वो संगीत के सुर ऐसे होने चाहिए कि उसे सुनकर आपको चैन मिले। जिस लय पर केवल आपका शरीर हरकत करे, वह अच्छा नहीं है।

मुंबई में भी खूब स्ट्रग्ल करना पड़ा

मोहम्मद हुसैन ने बताया कि एक बार हम जयपुर में परफॉर्म कर रहे थे, तब वहां सितारा देवी भी आई हुई थी। परफॉर्मेंस के बाद उन्होंने अपने साथ मुम्बई चलने को कहा। वहां काम तो मिल रहा था, लेकिन पैसा ज्यादा नहीं मिल पा रहा था। इसके चलते हम जयपुर आकर काम करते थे और फिर कुछ पैसे जोड़कर मुम्बई चले जाते थे। इस दौरान सिताराजी ने हमें कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया। 1970 में हमारा एलबम ‘गुलदस्ता’ रिलीज हुआ, जिसका गाना 'मैं हवा हूं कहां वतन मेरा' बहुत पसंद किया गया। यह एलबम इतना लोकप्रिय हुआ कि हमने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।