
चकरी और कालबेलिया नृत्य से किया आकर्षित
भोपाल. मानव संग्रहालय में चल रहे वन अस्मिता कार्यक्रम में गुरुवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम 'गुंजार' का आयोजन किया। आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समारोह में एक ओर राजस्थान की लोक संस्कृति में कालबेलिया नृत्य में कालबेलिया जनजाती के जीवन की झलक देखने को मिली तो डिंडौरी के कलाकारों ने गीत-संगीत के माध्यम से अपनी देव आराधना और पूजा पद्धति के बारे में बताया।
कार्यक्रम में पहली प्रस्तुति राजस्थान के बांमरा क्षेत्र की प्रसिद्ध लोकनृृत्य कलाकार ममता देवी और साथियों ने चकरी व कालबेलिया नृत्यों की प्रस्तुति हुई। वहीं मप्र के डिंडौरी क्षेत्र से आए परधान कलाकारों ने अपने पारंपरिक वाद्य बाना की धुन पर बड़ा देव की जगार और गोंडवासी की युगल प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम की शुरुआत में चकरी लोकनृत्य की प्रस्तुति हुई। चकरी नृत्य राजस्थान राÓय के लोक नृत्यों में से एक है।
यह नृत्य हाड़ौती अंचल की कंजर जाति की युवतियों द्वारा विवाह के आयोजन पर किया जाता है। इस नृत्य में युवतियां बड़ा घाघरा पहनती हैं, जो बहुत ही आकर्षक सजावट का होता है। चकरी नृत्य करने वाली नर्तकी जब चक्कर लगाकर नाचती हैं तो उसके घाघरे का लहराव देखने लायक होता है। लगभग पूरे नृत्य में युवतियां लट्टू की तरह घूमते हुए नाचती हैं।
लोकरूचि व्याख्यान
वहीं अंतरराष्ट्रीय देशज जन दिवस के अवसर पर संग्रहालय की लोकप्रिय कड़ी संग्रहालय लोकरुचि व्याख्यान माला में प्रो. तामो मिबांग, पूर्व कुलपति, राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ईटानगर ने 'राईट्स ऑफ इंडिजिनस पीपुल्स: विथ स्पेशल रिफरेंस टू नार्थ ईस्ट इंडियाÓ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत की जनजातियां भारत के देश जन है। अपनी विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए उन्हें स्वयं ही आगे आना होगा। अपनी स्वयं की एक कार्य संस्कृति बनाकर कठोर परिश्रम करना होगा।
पुस्तक विमोचन
इसके साथ ही प्रो. एस एन चौधरी द्वारा देश जनों पर रचित एक पुस्तक 'ट्राइबल लाइव्लीहुडÓ का विमोचन किया गया। इस मौके पर प्रो. तामो मिबांग, संग्रहालय के निदेशक, प्रो. सरित कुमार चौधुरी एवं संग्रहालय के संयुक्त निदेशक दिलीप सिंह मौजूद रहे।
Published on:
10 Aug 2018 02:49 pm

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