ग्रामीण अंचलों में आज भी बीमारी को चिकित्सा समस्या मानने के बजाय ‘ऊपरी बाधा’ समझ लिया जाता है। कई बार सर्पदंश, बुखार, उल्टी-दस्त या मानसिक रोग जैसे मामलों में पहले ओझा-तांत्रिक के दरवाजे खटखटाए जाते हैं। जब तक परिवार को स्थिति की गंभीरता का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मरीज दम तोड़ देता है और जिम्मेदारी ‘भाग्य’ या ‘ईश्वर की मर्जी’ पर डाल दी जाती है। अंधविश्वास इतने हावी हैं कि लोग अस्पताल तक में टोने टोटके कर लेते हैं, इस आस में कि उनके परिजन की जान बच जाए।