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कविता में सुनाया – आदमी भी रो सकते हैं, रविवार की सुबह जुटे कई शहरों के कलाप्रेमी

- 43वीं पोएट्स वॉक का आयोजन - राजधानी में अब दूसरे शहरों से भी युवा कविता सुनने-सुनाने आने लगे

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भोपाल. राजधानी में अब दूसरे शहरों से भी युवा कविता सुनने-सुनाने आने लगे हैं। रविवार की सुबह छतनारा आर्ट होम की ओर से सैर सपाटा के पास 43वीं पोएट्स वॉक का आयोजन किया गया। इसमें ना सिर्फ शहर के कवि बल्कि जबलपुर और् सुहागपुर जैसे शहरों के कवि भी जुटे। इस कार्यक्रम को युवा शायर अभय शुक्ला ने होस्ट किया। शुरुआत ग़जल के साथ हुई। इसके बाद दशमेश ने आदमी भी रो सकते हैं कविता का पाठ किया। ऊषा शर्मा ने स्त्री के निज जीवन के बारे में कविताएं पढ़ीं। बैंक मैनेजर शिवम ने भावनात्मक द्वंदों के ऊपर कविताएं सुनाई। वहीं जबलपुर से आए आदित्य सेंगर ने बाल कविताएं पढ़कर सुनाई। स्वर्णा तिवारी ने स्वरचित कविताएं सुनाईं जिनमें एक आम आदमी की उलझनों का चित्रण किया। निशांत ने कन्नड़ कवि अक्का महादेवी की कविताओं का हिन्दी अनुवाद सुनाया और साथ ही उनका जीवन परिचय दिया।

इस दौरान युवा कवि स्वर्णा तिवारी ने कुछ पक्तियां सुनाई -

कट जाती है रात यूँ ही
बीती सुबह की यादों में
और हो आता है नया सवेरा
कैद नई यादें करने।

वक्त भी है यायावर कोई
कुछ लम्हे ठहरता ही नहीं
कि हाथ आए तो रोक लूँ एक पल
मुसाफ़िर अपनी मस्ती का रुकता ही नहीं।

क़ब्र में पैर लटकाए
भागती उम्र की रस्सी थामे
फिर हो आती है ज़िद्द जीने की
इस बच्चे मन को कौन समझाए ।

गिनी चुनी उधार की साँसें हैं
किसी कर्मचारी सी जिंदगी है
उम्र की तय तनख्वाह है और
ख़्वाबों की लंबी फ़ेहरिस्त है ।

ख़ुशी इस बात की
हर इच्छा पूरी कर ली
आ ही गया वक़्त रवानगी का
तब याद आई खाता-बही काम की।

चार लफ्ज़ों का तो इंसान था
चार कंधों पर चढ़ा हुआ
चार दिन लेकर आया था
चार पल का गुज़रा हुआ।