
योगेंद्र सेन @ भोपाल. कोरोना तो चला गया, लेकिन हमारी ङ्क्षजदगी को कई तरह से प्रभावित कर गया। बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहे। दो साल तक घरों में 'कैद' रहने के बाद अब जब स्कूल पूरी तरह खुल गए हैं, तो अनेक बच्चों में कोरोना के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। खासकर छोटे बच्चों में। ऑनलाइन क्लास, ऑनलाइन परीक्षा ने पहली से पांचवीं कक्षा के अनेक बच्चों की पढऩे-लिखने और याद करने की क्षमता को प्रभावित किया है। पहली कक्षा के कुछ बच्चे तो ठीक से क, ख, ग और ए, बी, सी, डी तक नहीं लिख पा रहे। दूसरी से पांचवीं कक्षा तक के कई बच्चों हिंदी और अंग्रेजी के वाक्य ठीक से नहीं पढ़ पा रहे। ऐसे बच्चों के अभिभावक परेशान हैं, क्योंकि उनका बच्चा स्कूल में टीचर द्वारा करवाया गया क्लासवर्क आधा-अधूरा लिखकर लाता है। ऐसे में कई अभिभावक डॉक्टर्स, चाइल्ड एक्सपर्ट और मनोचिकित्सक से सलाह ले रहे हैं। ये परेशानी केवल बड़े शहरों के बच्चों के साथ नहीं है। भोपाल के आसपास के जिलों और छोटे कस्बों से भी माता-पिता अपने बच्चों की परेशानी लेकर एक्सपर्ट के पास भोपाल आ रहे हैं।
केस-1
भोपाल में एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले संदीप शर्मा (परिवर्तित नाम) का आठ साल का बेटा कॉन्वेंट school में पढ़ता है। लॉकडाउन लगा तो कक्षा एक में था। दो साल तक पढ़ाई और परीक्षाएं online हुईं। रिजल्ट भी अच्छा रहा। अब school जाने लगा तो पता चला कि हिंदी और अंग्रेजी के वाक्य ठीक से नहीं पढ़ पा रहा। वे हैरान-परेशान हैं कि तीसरी क्लास में कुल 12 किताबें हैं। ऐसे में आगे कैसे पढ़ पाएगा।
केस- 2
राजधानी के पुराने शहर निवासी सूरज सिंह (परिवर्तित नाम) की बेटी शहर के बड़े कॉन्वेंट school में पांचवीं क्लास में पढ़ती है। मार्च से school खुल गए और बेटी क्लास में जाने लगी है। लेकिन परेशान यह है कि वह पहले की तरह सवाल-जवाब याद नहीं कर पा रही। school में जो पढ़ाया वह याद नहीं कर पाती। जबकि पहले टीचर द्वारा दिया गया होमवर्क पूरा याद कर लेती थी। अब कोर्स भी बहुत ज्यादा है तो कैसे पढ़ाई करेगी।
इसलिए आ रही children में ये परेशानी
1- दो साल तक बच्चे घर में रहे। इस दौरान ऑनलाइन क्लासेस ने उन्हें मोबाइल, टीवी और नेट फ्रेंडली बना दिया। बच्चे मोबाइल और टीवी पर ज्यादा समय बिताने लगे।
2- स्कूल में बच्चा नियमित क्लास में बैठता है, तो टीचर से उसका आई कॉन्टेक्ट होता है। शैतानी करने पर डांट पड़ती है तो अच्छा काम करने पर शाबासी मिलती है। ऑनलाइन क्लास में ये सब नहीं हुआ।
3- ऑनलाइन क्लासेस में बच्चे उस अनुशासन में नहीं रहे जैसे स्कूल में रहते हैं। इधर क्लास चल रही है, उधर बच्चा खेलता रहता है।
4- बच्चों को होमवर्क भी मिला तो वे किताबों से देख-देखकर लिखने के आदी हो गए।
5- ऑनलाइन परीक्षाएं हुईं तो बच्चों को माता-पिता ने पूरा सहयोग किया। एक तरह से बच्चों पर पढ़ाई का कोई दबाव ही नहीं था। इसलिए वे लर्निंग प्रोसेस से दूर होते चले गए।
एक्सपर्ट ने कहा- घबराएं नहीं, ये करें अभिभावक
- बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव नहीं डालें।
- उनके साथ सकारात्मक व्यवहार रखें।
- बच्चों को थोड़ा Óयादा समय दें।
- पढऩे-लिखने के लिए रोज एक निश्चित समय तय करें।
- अगर अभिभावक नहीं पढ़ा सकते तो टृयूशन टीचर की मदद लें।
ऐसे मामलों में अभिभावक भी दोषी हैं
जब से स्कूल शुरू हुए हैं, मेरे पास रोज ऐसे एक-दो केस आ रहे हैं, जिनमें माता-पिता को उनके बच्चों की लर्निंग को लेकर परेशानी है। भोपाल ही नहीं आसपास के छोटे शहरों से भी ऐसे केस आ रहे हैं। एक बात ये भी है ऐसे केसों में ज्यादातर माता-पिता ने भी लापरवाही बरती। दो साल तक उन्होंने बच्चों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। बच्चों मोबाइल और टीवी पर ज्यादा वक्त बिताने लगे। अब अचानक बच्चों पर दबाव आ गया है। इस स्थिति से निकलने के लिए अभिभावकों का ही रोल अहम है। उन्हें बच्चों के साथ एकदम तानाशाही और उग्र रवैया नहीं अपनाकर सकारात्मक व्यवहार रखना होगा, बच्चे जल्दी रिकवर करेंगे।
- रूमा भट्टाचार्य, अध्यक्ष, इंडियन साइकेट्री सोसायटी एमपी स्टेट ब्रांच
बच्चे जल्दी रिकवर कर लेंगे
कोरोना ने कई तरह से प्रभाव डाला है। बच्चे भी प्रभावित हुए हैं। दो साल बाद अचानक उनका सोने-उठने से लेकर खेलने-कूदने, पढऩे-लिखने का रूटीन बदल गया है। कुछ बच्चे इसमें एडजस्ट नहीं कर पाए। लेकिन घबराने की बात नहीं है। धीरे-धीरे एक-दो महीने में बच्चे इसे कवर कर लेंगे।
-रुचि सोनी, असी प्रोफेसर, मनोचिकित्सा विभाग, गांधी मेडिकल कॉलेज
बच्चों की सीखने क्षमता बहुत हाई होती है
बच्चों की लर्निंग कैपेसिटी बहुत हाई होती है, इसलिए उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। कोरोना के दौरान इन दो सालों में टीवी और मोबाइल के संपर्क में ज्यादा रहने से लर्निंग और रीडिंग की समस्या तो हुई है। एकदम से कोई भी आदत नहीं छूटती। अब नियमित क्लासेस शुरू हो गईं हैं, तो बच्चे जल्दी ही इसे कवर कर लेंगे।
- डॉ. राकेश मिश्रा, शिशु रोग विशेषज्ञ
Updated on:
09 Apr 2022 08:19 pm
Published on:
07 Apr 2022 07:00 am

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