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सियासत के केंद्र में होने के बावजूद 230 में से 48 सीटों पर मतदान में पिछड़ी लाड़ली बहनाएं

- साल 2018 के मुकाबले 0.3 प्रतिशत से लेकर 5.76 प्रतिशत तक आई गिरावट

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फाइल फोटो: मतदान के लिए लगी लंबी कतार।

इस बार के चुनावों में अगर कुछ सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहा तो उनमें लाडली बहना सबसे अव्वल रहीं। वैसे तो सूबे की सियासत का केंद्र बिंदू ही महिलाएं रहीं लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने आधी आबादी को लुभाने के लिए खूब डोरे डाले। भाजपा तो लाडली बहना योजना के दम पर ही मैदान में ताल ठोक रही थी। तो वहीं कांग्रेस भी महिलाओं को साधने के लिए सस्ता सिलेंडर से लेकर सरकार आने पर 1500 रूपए नकद देने का वादा किया। लेकिन सियासी दलों के सर आंखों पर बैठाने के बावजूद पत्रिका की पड़ताल में ये तथ्य सामने आया है कि प्रदेश की 230 सीटों में से 48 सीटें ऐसी रहीं जहां लाडली बहना मतदान में पीछे रही हैं।

0.3 प्रतिशत से लेकर 5.76 प्रतिशत तक गिरा मतदान प्रतिशत

बता दें प्रदेश की ऐसी 48 सीटों में ज्यादातर सीटें 35 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों की हैं। लेकिन इसी सूची में सबसे शीर्ष पर रहने वाली सीट राजधानी भोपाल की दक्षिण- पश्चिम है, जहां साल 2018 के मुकाबले इस बार महिलाओं ने माइनस 5.76 प्रतिशत कम वोटिंग की है। और एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि इन सीटों में लगभग हर क्षेत्र समाहित हैं। मालवा- निमाड से लेकर विंध्य, महाकौशल तक की सीटें इस सूची में शूमार है।
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जानिए सीटों का गणित

क्षेत्र- सीट

ग्रामीण- 35

अर्ध- शहरी- 10

शहरी- 03
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प्रदेश की उन शीर्ष 15 सीटों का ब्यौरा जहां लाडली बहना मतदान में पिछड़ी

सीट- महिला प्रतिशत(2018)- प्रतिशत(2023)- गिरावट प्रतिशत

भोपाल दक्षिण- पश्चिम- 65.42- 59.66- 5.76

बड़वानी- 75.49- 71.62- 3.87

सरदारपुर- 78.83- 75.07- 3.76

रैगांव- 74.74- 71.15- 3.59

कुरई- 79.75- 76.52- 3.23

बड़वाह-79.64- 76.90- 2.74

महू- 78.04- 75.63- 2.41

भोपाल मध्य- 61.82- 59.54- 2.28

मनावर-77.71- 75.49- 2.22

खंडवा- 66.84- 64.74- 2.10

खांचरोद- 80.39- 78.34- 2.05

नागौद-78.67- 76.70- 1.97

चितरंगी- 75.21- 73.25- 1.96

बुरहानपुर-74.91- 73.05- 1.86

मानधाता-77.60- 75.79- 1.81

इसका नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा

मत प्रतिशत बढ़ने को अमूमन लाडली बहना से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन जहां तक सवाल महिलाओं के मतदान प्रतिशत घटने का है तो बिल्कुल स्वाभाविक बात है कि इन सीटों पर सरकार महिलाओं की योजनाओं का प्रचार- प्रसार करने में पीछे रही है। इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

महेश श्रीवास्तव, राजनीतिक विश्लेषक