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प्रेमिका के लिए युवक ने अपनी पत्नी को छोड़ा, महिला ने खड़ा किया अपना बिजनेस, जानिए कहानी…

वीरांगना नाट्य समारोह के पहले दिन नाटक 'बीती अमावस की रतिया' का मंचन

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पूर्वरंग में वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ. लता सिंह मुंशी की शिष्याओं की भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुति दी।

भोपाल। रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप में शनिवार से वीरांगना नाट्य समारोह शुरू हुआ। पहले दिन नाटक 'बीती अमावस की रतिया' का मंचन हुआ। गीताश्री लिखित इस नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन स्वास्तिका चक्रवर्ती ने किया। 50 मिनट के इस नाटक में 14 कलाकारों ने ऑनस्टेज अभिनय किया। इससे पहले पूर्वरंग में वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ. लता सिंह मुंशी की शिष्याओं की भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुति दी। प्रस्तुति की शुरुआत नृत्यांगनाओं ने देवी के आह्वान के साथ किया। इसमें उन्होंने महालया की प्रस्तुति दी। प्रस्तुति में पारम्परिक धूनिंची नृत्य का प्रयोग किया गया। प्रस्तुति के अगले क्रम में नृत्यांगनाओं ने देवी सशक्तिकरण की प्रस्तुति दी। इसके माध्यम से ब्रम्हा, विष्णु, महेश सभी देवों द्वारा मां को प्रणाम करते हुए दिखाया कि मां की शक्ति के सामने सभी नतमस्तक हैं।

शादी की रात ही छोड़ जाता है पति
नाटक में पुरुष प्रधान समाज में महिला के सशक्त बनने की कहानी को दिखाया गया। नाटक की कहानी उम्मों नाम की ग्रामीण महिला के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। नाटक की कहानी फ्लैशबैक से शुरू होती है। जहां 25 साल पहले मालभोग सिंह ठाकुर की शादी ग्रामीण लड़की उमा से जबरदस्ती करवा दी जाती है। मालभोग किसी दूसरी लड़की से प्यार करता है। नाराज होकर मालभोग शादी के दिन ही घर से भाग जाता है। मां, बहू को ही बेटे के रूप में अपनाने का फैसला लिया। घरेलू कामकाज में माहिर उमा ने धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई पूरी करती है। अपने काम में वो इतनी निपुण हो गई कि दूसरी गांव की लड़कियों को वो इस काम में माहिर करने लगी। एक दिन मालभोग की पत्नी घर छोड़कर चली जाती है तो मालभोग सोचता है कि उसकी एक पत्नी भाग गई तो क्या हुआ दूसरी पत्नी गांव में है। वो यह सोचकर गांव वापस आ जाता है।

पति को अपनाने से इंकार कर देती है उमा
गांव आकर वो देखता है कि उमा पहले की तरह अबला नहीं है वो अब सबल हो गई और आत्मनिर्भर बन गई है। उमा के इस उत्कृष्ट कार्य के लिए कलेक्टर उसे सम्मानित करने के लिए आते है। घर के बाहर मालभोग को देख उमा उसे अपनाने से इंकार कर देती है और समाज के सामने कहती है कि स्त्री को भोग का साधन नहीं है मालभोग...। जब मन चाहा अपना लिया और जब मन चाहा छोड़ दिया। उमा ने मालभोग को अपनाने से इंकार कर दिया और वो नौकरी करने चली जाती है।