
अंग्रेजी हमारी आवश्यकता है, हिंदी हमारी संस्कृति, इसके बिना विकास संभव नहीं
भोपाल. देश में हिंदी को बढ़ावा देने निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन आज भी शिक्षकों को हिंदी पढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनका मानना है कि शुरुआती कक्षाओं से विद्यार्थियों को हिंदी का सही ज्ञान नहीं मिलता है। जिससे जब वे बढ़ी कक्षाओं में पहुंचते हैं तो उन्हें वर्णमाला से हिंदी की शुरुआत करनी पड़ती है। आज हर व्यक्ति अंग्रेजी में बात कर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहा है। भले ही अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया जा रहा हो लेकिन हिंदी के बिना देश का विकास संभव नहीं है। इसे रोजगार की भाषा में शामिल करने की जरूरत है।
जो रस हिंदी में है वह अंग्रेजी में नहीं
हिंदी हमारी मातृभाषा है। संस्कृत प्राचीन भाषा है। इससे ही हिंदी की उत्पत्ति हुई। संस्कृत मां और हिंदी उसकी बेटी है, जबकि हिंदी की बहन उर्दू है। हिंदी विशेष रूचिकर है। देश में भले ही अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया जा रहा हो लेकिन हिंदी के बिना देश का विकास संभव नहीं है। हमारी पहचान मातृभाषा से ही होती है। अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करने के बाद भी कुछ विद्यार्थी ङ्क्षहदी में बहुत रुचि रखते हैं। जो रस हिंदी में मिलता है वह रस अंग्रेजी में नहीं मिलता। आज अंग्रेजी हमारी आवश्यकता है लेकिन हिंदी हमारी संस्कृति है। इसलिए संस्कृति के बिना किसी भी व्यक्ति का विकास नहीं हो सकता। हिंदी पढ़ाने में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हमारी समाज आज भौतिकवादी युग की ओर बढ़ रहा है। जिस कारण हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी में ही बोले, पढ़े और लिखें। इससे उनके बच्चों का ज्ञान अधूरा हो जाता है न बच्चे अंग्रेजी के हो सकते हैं न हिंदी के हो पाते हैं।
डॉ. गीता सिंह, उच्च श्रेणी शिक्षक हिंदी
व्यापारिक स्तर पर लाना होगा
प्रायमरी कक्षाओं में विद्यार्थियों को मात्रा का ज्ञान कम होता है। हिंदी लिखने में उनकी यह गलती जीवनभर चलती है। पहले हिंदी पाठ्यक्रम में सामान्य और विशिष्ट के रूप में शामिल होती थी लेकिन अब ये सिर्फ भाषा के रूप में ही शामिल है। हायर क्लास फैमिली अंग्रेजी में बातकर ही अपना प्रभुत्व स्थापित करती है। इसलिए विद्यार्थी भी उसकी ओर आकर्षित होते हैं। इसलिए हिंदी को व्यापारिक स्तर पर लाना होगा। तभी इसका स्थान ऊंचा हो सकेगा।
कमलेश उपाध्याय, हिंदी व्याख्याता
वर्णमाला का ज्ञान होना जरूरी
हमारे देश में पहली से लेकर आठवीं तक हिंदी को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है। जब विद्यार्थी नौवीं कक्षा में आता है तो उसे हिंदी व्याकरण का ज्ञान नहीं होता। विद्यार्थियों में जब तक वर्णमाला और मात्राओं का ज्ञान नहीं होगा तब तक उनमें हिंदी के प्रति रुचि पैदा नहीं होगी। हमारी हिंदी क्रम से चलती है। हिंदी पूरी तरह वैज्ञानिक है। विद्यार्थियों को हिंदी का क्रमबद्ध ज्ञान होना जरूरी है। हिंदी को रोजगार की भाषा बनानी होगी। क्योंकि देश का बहुत बड़ा प्रतिशत हिंदी भाषी ही है।
डॉ. रीना गुप्ता, हिंदी अध्यापक
Published on:
14 Sept 2021 12:14 am
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