
राधेश्याम दांगी भोपाल/ कमला पसंद, राजश्री और ब्लेक लेबल व शिमला-विमल पान मसाला और गुटखा फैक्ट्रियों के छापे में आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ को टैक्स चोरी के साथ ही राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने का भी खुलासा हुआ है। ईओडब्ल्यू की जांच में गोविंदपुरा स्थित दो फैक्ट्रियों के मालिक कानपुर निवासी कमलकांत चौरसिया, फ्रेंचाइजी होल्डर शेख मोहम्मद आरिफ और वैभव पांडे द्वारा राजनीतिक पार्टियों को हर साल 200 करोड़ रुपए देने का खुलासा हुआ है।
इधर, स्टेट जीएसटी की जांच रिपोर्ट के बाद गुटखा कंपनियों, उत्पादकों और फ्रेंचाइजी होल्डर सहित अन्य के खिलाफ गुरूवार को केस दर्ज होगा। जीएसटी प्रबंधन ने ईओडब्ल्यू को जांच रिपोर्ट सौंप दी है। अब ईओडब्ल्यू स्टेट जीएसटी द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट की भी जांच करेगा। यह पता लगाया जाएगा कि स्टेट जीएसटी ने टैक्स चोरी, भारी मात्रा में गुटखा उत्पादन आदि पर अब तक क्यों ध्यान नहीं दिया और इसमें जीएसटी के किन-किन अधिकारियों की मिलीभगत है।
साथ ही यदि स्टेट जीएसटी के अफसरों ने टैक्स चोरी की रिपोर्ट और दस्तावेजों में हेरफेर कर रिपोर्ट बनाई तो संबंधित अधिकारियों को भी आरोपी बनाया जाएगा। ईओडब्ल्यू को मिले तथ्य में इस बात की पुष्ठि हुई है कि जीएसटी के अधिकारियों की मिलीभगत के कारण ही इतना बड़ा गुटखा रैकेट एक दशक से चल रहा था।
जीएसटी की रिपोर्ट के बाद खुद करेगा आकलन
ईओडब्ल्यू को आशंका है कि छापे में मिले दस्तावेजों के टेक्स आंकलन, विश्लेषण में स्टेट जीएसटी के कुछ अधिकारी गुटखा कारोबारियों को बचा सकते हैं। इसके संकेत छापे के दिन ही ईओडब्ल्यू को मिल गए थे। छापे की कार्रवाई के दौरान ही स्टेट जीएसटी का अमले को यह कहते सुना गया कि ईओडब्ल्यू को कार्रवाई करने की क्या जरुरत थी?, हमें ही बता देते। जीएसटी के अफसरों की यह बात सुनकर ईओडब्ल्यू अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है। बताया जा रहा है कि जीएसटी द्वारा भेजी गई जांच रिपोर्ट के तथ्यों को तीसरे पक्ष से एक बार फिर जांच करवाया जाएगा। ताकि यदि जीएसटी के अफसरों ने कोई हेरफेर की हैं तो इसे पकड़ा जा सके।
निरीक्षण करने नहीं जाते थे
ईओडब्ल्यू की जांच में यह भी तथ्य सामने आए है कि विद्युत विभाग का अमला कमला पसंद और राजश्री गुटखा कारखानों में कई साल से निरीक्षण करने नहीं पहुंचा। बिजली विभाग के अमले ने भी 7 साल से बिजली की खपत का ऑडिट नहीं किया। इधर, खाद्य विभाग की टीम ने भी दस साल से फैक्ट्री के भीतर जाकर सैंपल नहीं लिए।
वहीं, नापतौल विभाग की टीम भी फैक्ट्री के अंदर 8 साल से नहीं गई। ईओडब्ल्यू के एक सीनियर अफसर ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि हर जिम्मेदार अधिकारी-विभाग की गुटखा फैक्ट्री संचालक से सेटिंग थी। साथ ही राजनीतिक दल को सालाना एकमुश्त रकम चंदा दिया जाता था, इसलिए कोई इन फैक्ट्रियों में दाखिल नहीं हो पाता था।
Published on:
16 Jan 2020 10:37 am
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