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सुनाते हैं 1857 की गाथा, इनकी गाथा कौन सुने…?

झांसी की रानी की वीर गाथा खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, जिसे लोग आज भी नहीं भूले हैं। यह गाथा सुनाने वाले हरबोला जाति लुप्त होने की कगार पर है...।

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Manish Gite

Oct 02, 2015

Harbola Caste on the verge of extinction

Harbola Caste on the verge of extinction

हरबोलो (बसदेवा) देश का वो समाज है जो आजादी की पहली क्रांति का गवाह है...लेकिन समय के साथ आज वही समाज की यह विधा विलुप्त होती जा रही है। पत्रिका डॉट कॉम की खास पेशकश में इस बार प्रस्तुत है हरबोलो के इतिहास औऱ वर्तमान स्थिति की गाथा...

विवेक दत्त मिश्रा. भोपाल
1857 को देश का कोई भी व्यक्ति नहीं भूल सकता, क्योंकि इसी दौर में ही क्रांति की पहली मशाल जली थी। उसी क्रांति में उदय हुआ था हरबोले शब्द का। क्योंकि एक जगह से दूसरी जगह गुप्त रूप से संदेश पहुंचाने का यह लोग किया करते थे। यह समाज बुंदेलखंड के साथ-साथ महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश औऱ बिहार में रहता है। इनके रोजी का जरिया भी गाना-बजाना ही था। इस समाज की खासियत यह है कि इन्हें जो भी दान मिलता है, उसे छुपाते नहीं हैं, बल्कि उसका शिद्दत से गुणगान करते हैं।


खूब लड़ी वह तो झांसी वाली...


हरबोले नगरों में आकर ऊंचे-ऊंचे पेड़ या ऊंची चट्टान पर उच्च स्वर में लोकगीत गाते थे। इनके लोक गीतों में आल्हा उदल और झांसी की रानी की कहानियां प्रमुख होती थीं। हरबोलों के गीतों में राजा और उनकी सेना की हौसला अफजाई की जाती थी। वहीं लड़ाइयों के बाद उनकी वीरता और शौर्य की गाथाएं गीतों में लोगों तक पहुंचाई जाती थीं। झांसी की रानी की वीर गाथा खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, जिसे लोग आज भी नहीं भूले हैं।


नाटक में भी दिखी संस्कृति
हरबोले समाज के गाए लोक गीतों की धुन का इस्तेमाल एक नाटक में भी किया गया है। प्रसिद्ध अभिनेता गोविन्द नामदेव द्वारा निर्देशित नाटक मधुकर कौ कटक में भी यह समाज चर्चा पा चुका है। नाटक में बुंदेलखंड के क्रांतिकारी नायक मधुकर शाह बुंदेला की ऐतिहासिक गाथा को प्रस्तुत किया गया था। बुंदेला ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। सागर गजेटियर में भी इसका उल्लेख है।


गुमनामी में जी रहा समाज

1980 के बाद पुराने मध्यप्रदेश में हुई कला गतिविधियों में इस बसदेवा समाज का सर्वेक्षण तो हुआ पर किसी भी कलाकार या समूह का नाम जनता के सामने उभकर सामने नहीं आ पाया। यह समाज आज भी अपने समाज में हुए अपराधों को अपनी ही पंचायत में निपटाते हैं। पुरुषों का काम शहद तोड़कर लाना था और महिलाओं का काम सूप बनाना है। इनका शैक्षणिक स्तर शून्य है। इस कारण इस जाति के लोग अपराधों में भी लिप्त पाए गए हैं। देश या किसी राज्य की सरकार ने इनके संरक्षण और इनकी रोजी-रोटी के लिए कोई भी काम नहीं किया। इनके समाज गुमनामी का जीवन जीते-जीते आज भी वो अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। अब जीवन यापन के लिए लोकगीत अपर्याप्त होने के कारण इन्हें अब अन्य व्यवसाय करना भी मजबूरी बन गया है।


पांच वर्षों से शोध कर रहे हैं नीरज कुंदेर


पिछले 5 वर्षों से बसदेवा गायन परंपरा पर कार्य करने वाले नीरज कुंदेर का कहना है कि उन्हें जैसे ही पता चला कि हरबोले आज भी है, तो उन्होंने उनकी तुरंत खोज शुरू कर दी। सबसे पहले उन्होंने मैहर के पास उचेहरा में हरबोलो की दो बस्तियों में दिनभर रहकर कार्य किया। उनकी कार्यशैली, जीवन-यापन के बारे में पूछा तो पता चला कि अब बहुत कम हरबोले गायन परंपरा में है। बसदेवा के भजन-कीर्तन करने वाले लोग बसदेवा कहलाये, किन्तु वे बसदेवा जो श्रवण कुमार की गाथाएं गाते हैं। वे बसदेवा के अंतर्गत श्रावणी ब्राह्मण कहलाते हैं।


भोपाल में भी है इनकी बस्तियां


पहले यह जाति जंगलों में ही निवास करती थी, लेकिन अब जो बचे हैं वे मजदूरों करने शहरों तक पहुंच चुके हैं। उचेहरा से ही मुझे पता चला की कटनी के पास व जबलपुर के पास सलीमनाबाद, सतना के पास नागौद, पन्ना के सलेहा में भोपाल में छोला रोड के पास इनकी कुछ बस्तियां हैं।

वीडियो में देखें कैसे सुनाते थे वीर गाथा...


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