1857 को देश का कोई भी व्यक्ति नहीं भूल सकता, क्योंकि इसी दौर में ही क्रांति की पहली मशाल जली थी। उसी क्रांति में उदय हुआ था हरबोले शब्द का। क्योंकि एक जगह से दूसरी जगह गुप्त रूप से संदेश पहुंचाने का यह लोग किया करते थे। यह समाज बुंदेलखंड के साथ-साथ महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश औऱ बिहार में रहता है। इनके रोजी का जरिया भी गाना-बजाना ही था। इस समाज की खासियत यह है कि इन्हें जो भी दान मिलता है, उसे छुपाते नहीं हैं, बल्कि उसका शिद्दत से गुणगान करते हैं।