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दोस्तों ने गोबर से भरे बाथटब में डूबो दिया, डर के चलते विरोध भी नहीं कर पाए थे ये एक्टर्स

फिल्म की शूटिंग के चलते कोई मुंबई में मना रहा होली तो कोई अपनों के साथ घर में कर रहा सेलिब्रेशन

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होली वो खास दिन होता था तब सीनियर आर्टिस्ट भी सीनियर-जूनियर का भेद भूलकर साथ मस्ती करते थे।

मुंबई नहीं घर में दोस्तों के साथ होली मनाना है पसंद

भोपाल. होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भाव है जो हमारे दिलों से निकलकर अपनों के दिलों को प्यार से रंग देता है। इस खास दिन सब अपने बचपन में पहुंच जाते हैं, कौन छोटा-कौन बड़ा, हर कोई यारों के साथ यादों के समंदर में भी डुबकी लगाता है। इसमें कभी मस्ती होती है तो कभी झगड़ा, लेकिन ये झगड़ा भी चंद ही पलों में पिचकारी से निकली हर बूंद के साथ फिर हमें दोस्ती के रंगों से सराबोर कर देता है। इस खास मौके पर शहर के युवा कलाकारों से जाना कि उनके जीवन में होली के कौन से पल सबसे यादगार रहे।

एनएसडी में सीनियर सुनाते थे यादगार किस्से
फिल्म एक्टर गोदान कुमार का कहना है कि भोपाल की होली मेरे लिए सबसे यादगार पल होती है। जब मैं एनएसडी दिल्ली में पढ़ाई कर रहा था तो उस समय दिल्ली में ही होली मनाता था, ये वो खास दिन होता था तब सीनियर आर्टिस्ट भी सीनियर-जूनियर का भेद भूलकर साथ मस्ती करते थे। मेरे कुछ दोस्त होली खेलने से डरते थे और होली के दिन कहीं छिप जाते थे। इसलिए एक बार हमने उन्हें होली से पहले ही रंगने का प्लान बनाया। ये प्लान उन्हें पता चला गया, मैं जब उसके घर पहुंचा तो उसने ही मुझे रंग डाला। इसके बाद सबने मिलकर खूब धमाल मचाया। मुंबई शिफ्ट होने के बाद भी मैं होली मनाने नेहरू नगर स्थित घर आता हूं।

हमारा ग्रुप हर किसी को रंग लगा देता था
एक्टर प्रखर सक्सेना का कहना है कि होली के दिन हम दस दोस्तों का ग्रुप पूरे शहर में दंबगई से घूमता था और जिसे चाहे रंग देता था। एक मोहल्ले में हमसे भी बड़े ग्रुप ने हमें रोक लिया और कहा कि यहां से निकलना है तो इस टब में डूबकी लगानी होगी। उसमें रंग, भांग और गोबर मिला हुआ था। दोस्त ने कहा कि यहां से निकल नहीं पाएंगे। मजबूरी में हम सभी को उसमें डूबकी लगानी पड़ी। पिछले साल मैंने मुंबई में ही होली मनाई थी। इंडस्ट्री से जुड़े जितने भी दोस्त थे, सभी एक जैसा कॉस्ट्यूम पहनकर मुंबई की सड़कों पर घूमते रहे।

तैयार होकर जाता था दोस्तों को रंग लगाने
एक्टर सौरभ पचौरी का कहना है कि इन दिनों में एक फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं तो भोपाल नहीं आ पाया। इस बार यहीं होली खेलूंगा। बचपन में होलीका दहन के लिए लकड़ियां एकत्रित करते थे तो किसी भी पड़ोसी या परिचित के घर के बाहर लगे पेड़ से लकडिय़ां काट लाते थे। बाद में घर में खूब डांट भी पड़ती थी। कुछ दोस्त ऐसे भी थे जो होली के दिन घर से गायब हो जाते थे तो शाम को नहाने के बाद मैं उनके घर जाता था। उन्हें यकीन हो जाता था कि अब ये रंग नहीं लगाएगा। इसके बाद उसे पूरी तरह से रंग देने का अपना ही मजा होता था।