सीएम की नाराजगी के बाद तेजी से शुरू हुआ सड़कों का सुधार, एक दिन में ही कई किमी सड़कें दुरुस्त

- जो अफसर निरीक्षण के लिए समय नहीं निकाल पा रहे थे, उन्हीं की देखरेख में फुर्ती से शुरू हुआ काम, एसडीएम भी निगरानी में जुटे

भोपाल. शहर की सड़कों को लेकर सीएम शिवराज सिंह की नाराजगी का असर ये रहा कि कल तक जो अधिकारी निरीक्षण और जांच करने में ही सुस्ती बरत रहे थे। आनन फानन में उनकी निगरानी में ही सभी विभाग के अधिकारी सड़कें दुरुस्त करने जुट गए। यहां तक की जिस सीपीए को खत्म करने के लिए सीएम ने कहा, उस विभाग के अफसरों को भी अपनी सड़कों को चिंता सताने लगी और दौड़े-दौड़े काम कराने पहुंचे। आपको जानकार हैरानी होगी कि सीपीए ने एक दिन में शाहपुरा, मनीषा मार्केट, आकृति इको सिटी तथा बंसल अस्पताल तक की करीब 4 किलोमीटर सड़क का पेंचवर्क एक दिन में पूरा कर दिया। नगर निगम भी अपने क्षेत्राधिकार की सड़कों का मरम्मत कार्य तेजी से कर रहा है। कलेक्टर ने सभी एसडीएम को सड़क के पेंचवर्क और सुधार कार्य निगरानी के निर्देश दिए हैं।

शनिवार को संभागायुक्त कवींद्र कियावत ने नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, सीपीए व अन्य निर्माण एजेसियों की बैठक बुलाई। उन्होंने सभी विभागों से कहा कि अगले 24 घंटे में रिजल्ट दिखना चाहिए। इसके बाद बैठक जल्द खत्म हो गई और सभी विभाग के अफसर अपने काम पर निकल गए।

पीडब्ल्यूडी ने 6 किमी कराया पेंचवर्क
लोक निर्माण विभाग ने करोद मंडी, कोलार रोड, ललिता नगर, हबीबगंज अंडर ब्रिज, गणेश मंदिर रोड, डी मार्ट कोलार रोड, भारत टॉकीज, लांबाखेड़ा से इस्लाम नगर की छह किमी सड़कों का पेंचवर्क पूरा किया। कई महीनों से लोग गड्डों में हिचकोले खा रहे थे।

सड़कों के नाम, खर्च का ब्यौरा भी मांगा

संभागायुक्त ने बैठक कर सभी एजेंसियों से सड़क के नाम, उस पर होने वाले निर्माण कार्य और समय-सीमा के मान, खर्चे से शनिवार को ही प्लान मांगा है। बैठक में कलेक्टर अविनाश लवानिया तथा आयुक्त नगर निगम वीएस कोलसानी चौधरी भी उपस्थित थे।

यहां होती रही है चूक
- सड़क बनाने के बाद उसे तीन साल तक मेंटेन करने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग या निर्माण एजेंसी की होती है। अगर इस दौरान शहर में कहीं भी सीवर/ पानी/ टेलीफोन केबिल डालने के लिए अनुमति जारी होती है, वहां काम के बाद उसे उसी स्थिति में ठीेक करना है। लेकिन यहां इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। सड़कें फौरी तौर पर मिट्टी से भरकर छोड़ दी जाती हैं। नतीजा बरसात में वहीं से धंसने लगती हैं। उदाहरण डीआईजी बंगले की सड़क।

- बरसात शुरू होने के दो माह पहले तक जो सड़क खराब है, उसे कोई विभाग ठीक नहीं कराता। क्योंकि बरसात के बाद उन्हें फिर से सड़कों के रेस्टोरेशन कराना है। ऐसे में ये सोचकर की दो माह बाद काम कराना है सड़कें ऐसे ही छोड़ दी जाती हैं। नतीजा जो सड़क पहले ठीक हो सकती थी वो 70 फीसदी और डैमेज हो जाती है। उदाहरण होशंगाबाद रोड।

- ठेकेदारों की जमानत राशि जब्त कर सड़क सुधार का काम कराना चाहिए, लेकिन यहां अफसर और ठेकेदारों की साठगांठ का ही नतीजा है कि उनकी जमानत राशि कभी जब्त नहीं होती। एक दो केस को छोड़कर, विभाग फंड के इंतजार में सड़कों पर और गड्ढे होने देता है। नतीजा सड़क पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।

- सड़क बनाते समय उनमें उपयोग होने वाली निर्माण सामग्री (डामर, जीरा गिट्टी, बड़ी गिट्टी, मुरम, उसे समतल करने का तरीका) की जांच भी संबंधित विभाग को करानी चाहिए। कितने लेयर में सड़क बनी। पिछले 10 से 20 वर्षों में एक भी सड़क की जांच किसी विभाग ने एक्सपर्ट या लैब में मटेरियल भेजकर नहीं कराई।

प्रवेंद्र तोमर Reporting
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