
आदिवासी संस्कृति में स्त्री-पुरूष को समान दर्जा प्राप्त है
भोपाल। राजीव गांधी समकालीन अध्ययन पीठ बरकतउल्ला विश्वविद्यालय द्वारा जनजातियों की तत्व दृष्टि एवं जीवन दृष्टि का दार्शनिक आयाम विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिवस गुरुवार को टेक्निकल सेशन आयोजित किया गया। जिसकी अध्यक्षता प्रो. करमा उरॉव ने की। विशिष्ट अतिथि रिटायर्ड आईजी आरएलएस यादव थे।
प्रो. शरीफ मोहम्मद, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के अनुसार आदिम जनजातियां प्राकृतिक साधनों में जन्म लेते हैं। पलते-बढते हैं तथा प्रकृति में ही विलीन हो जाते हैं। बैगाओं की अभौतिक संस्कृति अपने आप में संपूर्ण और परिपूर्ण है। आदिम जाति एवं अनुसुचित जाति कल्याण विभाग के सेवानिवृत्त अपर संचालक आरएस श्रीवास्तव ने कहा कि आदिवासियों की जीवन दृष्टि प्रकृति के आसपास ही घूमती है। आदिवासी संस्कृति में स्त्री-पुरूष को समान दर्जा प्राप्त है। बदलते परिवेश में सवाल उठता है कि क्या आदिवासियों की जीवन और संस्कृति को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के समाजशात्र एवं समाज कार्य विभाग की डॉ. नीलू रावत के अनुसार किसी भी जनजाति की संस्कृति की तरह गोंड जनजाति में भी सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधियों को एक-दूसरे से पूर्णत: पृथक नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे अंत: संबंधित हैं। जैसे वन इनके सांस्कृतिक एवं आर्थिक दोनों पक्षों का अभिन्न हिस्सा है।
जनजातियों ने अपना ली जाति प्रथा
पं. श्यामाचरम शुक्ल महाविद्यालय धरसींवा रायपुर की सहायक प्राध्यापक रश्मि कुजूर के अनुसार पहाड़ी जनजाति में स्वास्थ्य लाभ पाने या बीमारी के उपचार करने, प्रसव करने आदि से संबंधित कई तत्व दृष्टि है जो इन्हें एक क्रिया विशेष को करने के लिए प्रेरित करता है। वहीं, शासकीय महाविद्यालय दुर्ग की सुचित्रा शर्मा ने कहा जनजातियों की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं होती हैं।
हिन्दू जाति के संपर्क में आकर जनजातियों ने जाति प्रथा अपना ली है। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों का प्रभावी क्रियान्वयन सार्थक परिणाम परिलक्षित कर सकती है। शिव कुमार पांडेय के अनुसार मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे के कुछ आदिवासी समुदाय काली गाय के गोबर और नर्मदा के पानी को बहुत पवित्र मानते हैं। परंतु इन दोनों ही चीजों को वे अपनी शादियों से बिल्कुल अलग रखते है। जनजातियां जंगल का उपयोग करती हैं परंतु वे इसका उपयोग बहुत ही सीमित मात्रा में करते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए जंगल बना रहे। वे एक पेड़ से उसकी छाल निकालने के बाद एक निश्चित समय के बाद उसकी छाल नहीं निकालते हैं।
Published on:
07 Dec 2018 01:12 pm

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