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पिछले चुनावों में जिन्हें घर बैठाया, मुश्किल में उन्हें ही टिकट थमाया

बैकफुट भाजपा-कांग्रेस, एंटी इंकम्बैंसी का डर  

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mahamukabla-2018

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राजेन्द्र गहरवार, भोपाल. भाजपा-कांग्रेस ने मुश्किल वक्त में अपने पुराने खेवनहारों को एक बार फिर पतवार सौंपी है। मौजूदा विधायकों की कमजोर और निष्क्रिय छवि के कारण उपजी एंटी इंकम्बैंसी को दूर करने के लिए ये फॉर्मूला निकाला है। इसके तहत 2008 और 2013 में जिन विधायकों के टिकट काटे थे, उन्हें इस बार चुनाव मैदान में उतार दिया है। ऐसे 15 चेहरों पर फिर दावं खेला है। पुरानों के लिए 2013 के विधायकों का पत्ता काट दिया है। दरअसल, सियासी दल एंटी इंकम्बैंसी का ठीकरा विधायकों के सिर फोड़ते आए हैं। भाजपा अब तक 2013 के 39 और कांग्रेस तीन विधायकों को घर भेज चुकी है। भाजपा ने 2013 में करीब 50 विधायकों का पत्ता काटा था। इन ठुकराए गए विधायकों में आठ को टिकट मिला है। बाकी छह 2003 में रहे विधायक हैं।
- चेहरा बदलने की रणनीति
भाजपा टिकट काटने और देने के पीछे हमेशा सर्वे और जिताऊ चेहरे की आड़ लेती है। उसका मानना है कि चुनाव में चेहरा बदलने से गेम पलट जाता है। जबकि, क्षेत्र में दूसरा विधायक होने के कारण अधिकतर की सक्रियता भी कम हो जाती है। एक पूर्व विधायक ने कहा, हमें तो अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि 2013 में टिकट क्यों काटा था। पार्टी ने कोई काम भी नहीं दिया और अब लडऩे के लिए कह दिया गया है।
- आरक्षित सीटें ज्यादा आसान
आरक्षित सीटों से पहली बार जीतकर आने वाले विधायक पार्टी के भीतर और क्षेत्र में अपनी धमक नहीं बना पाते। सत्ता पक्ष के होने के नाते सदन में भी उनकी भूमिका सीमित होती है। भाजपा ऐसे विधायकों की काउंसलिंग भी नहीं कराती। यहीं से उनकी कमजोर छवि की धारणा बनती है फिर चुनाव में बाहर कर दिए जाते हैं। हर चुनाव में अधिकतर आरक्षित सीटों से जीते विधायक ही निशाने पर आते हैं। एक वजह यह भी है कि टिकट कटने के बाद वैसी बगावत आरक्षित सीटों पर देखने को नहीं मिलती है। जैसी सामान्य सीटों पर होती है।
लड्डूराम कोरी - अशोकनगर 2008 में विधायक बने। इनका 2013 में टिकट काटा और गोपीलाल जाटव को प्रत्याशी बनाया। जाटव जीते अब उन्हें गुना भेजकर लड्डूराम को अशोकनगर से टिकट दिया है। इस बार पन्नालाल शाक्य शिकार बने।
राजेश कुमार वर्मा - गुनौर सीट से 2008 में जीते, 2013 में टिकट काटकर महेंद्र बागरी को प्रत्याशी बनाया। जीते पर अब उनका पत्ता कटा और राजेश की बारी आई।


जुगुलकिशोर बागरी - रैगांव से 2008 में जीते। मंत्री भी रहे। 2013 में टिकट काटकर उनके बेटे पुष्पराज बागरी को उतारा। हार के बाद की जुगुलकिशोर की वापसी है।

नागेंद्र सिंह - नागौद से 2008 के विधायक। 2013 में टिकट काटा। गगनेंद्र सिंह को प्रत्याशी बनाया। बाद में खजुराहो लोकसभा से लड़े और जीते। अब फिर विधानसभा चुनाव मैदान में हैं।
दिलीप जायसवाल - कोतमा से 2008 के विधायक। 2013 में टिकट कटा। राजेश सोनी प्रत्याशी बनाए गए। राजेश की हार, अब दिलीप जायसवाल की वापसी हुई।

देवी सिंह सैयाम - मंडला से 2008 के विधायक। 2013 में संपत्तिया उइके को टिकट देकर सैयाम को घर बैठाया। अब फिर प्रत्याशी।
गीताबाई उइके - घोड़ाडोंगरी से 2008 की विधायक। 2013 में टिकट कटा। 2016 के उपचुनाव में भी नहीं पूछा। मंगलसिंह धुर्वे का टिकट काटकर फिर गीताबाई को उतारा।

जमना सोलंकी - भगवानपुरा से 2008 के विधायक। 2013 में विजय सोलंकी को प्रत्याशी बनाया। जीते अब जमना सोलंकी याद आए।
वीरेंद्र रघुवंशी - शिवपुरी सीट 2003 में विधायक। मंत्री यशोधरा राजे सिधिंया के करीबी। एक बार फिर पार्टी ने टिकट दिया।

शिवराज शाह - मंडला से 2003 में विधायक थे। दो बार टिकट कटा। अब मुश्किल वक्त पर फिर शाह याद आए।
हरी सप्रे- कुरवाई से 2008 में विधायक थे। पिछले चुनाव में यहां से वीरसिंह पंवार भाजपा के टिकट पर जीते। अब फिर सपे्र को टिकट दिया है।

पंचूलाल प्रजापति - 2003 में देवतालाब से विधायक बने। विवादित होने पर 2008 में पत्नी पन्नाबाई को मनगंवा से टिकट दिया। वे जीतीं। 2013 में पन्नाबाई चुनाव हारी तो फिर पंचूलाल को उतार दिया।
प्रेमनारायण ठाकुर - 2008 में अमरवाड़ा विधायक बने। 2013 में पुत्र उत्तम को टिकट दिया। अब फिर से पिता प्रेमनारायण को मैदान में उतार दिया।

कलसिंह भाभर - थांदला से 2013 में भाजपा ने टिकट काटा तो भाभर निर्दलीय विधायक बन गए। अब पार्टी ने बुलाकर टिकट दे दिया।