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महाराजा छत्रसाल से औरंगजेब भी कांपता था, 22 साल की उम्र में मुगलों को रणभूमि में ललकारा

2 जून को मनाई जाती है महाराजा छत्रसाल जयंति

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भोपाल. भारत भूमि को आजाद कराने के लिए कई महान योध्दाओं ने प्राणों की आहुति दी थी। उन्हीं में से एक थे बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल। आज महाराजा की जयंति पन्ना नगर में धूमधाम से मनाई जायेगी। लेकिन आचार संहिता को देखते हुए इसे प्रशासनिक रूप से अधिक उत्साहपूर्वक न मनाते हुए सामाजिक रूप से इसे पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।

औरंगजेब भी रहता था भयभीत
महारजा धत्रसाल ने महज 22 साल की उम्र में मुगलों को रणभूमि में ललकारा था। उनका नाम इतिहास के पन्नों में महान प्रतापी राजा के रूप में दर्ज है। उनके इसी पराक्रम और रणकौशल को देखते हुए उन्हें बुंदेल केसरी की ख्याति से नवाजा गया है। मध्य भारत के इतिहास में जब भी बहादुरी और अदम्य साहसी योद्धाओं की बात की जाती है, तो छत्रसाल का नाम भी पन्नों में देखने को मिलता है। उनकी इसी वीरता के कारण औरंगजेब जैसे मुगल भी थर-थर कांपते थे।

छत्रसाल ने अपने गुरू प्राणनाथ जी के आशीर्वाद से पन्ना के जंगलों में एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी तैयार की थी। उन्होंने मुगलों के क्रूरतापूर्ण दमन और अन्याय के खिलाफ जंग छेढ़ी थी। 22 वर्ष की कम उम्र में उन्होंने 5 घुढ़सवारों और 25 पैदल सैनिकों के साथ मुगलों की विशाल सेना को रणभूमि में ललकारा था और उनकी छोटी सी सैन्य टुकढ़ी ने मुगलों की सुसज्जित सेना को पराजित कर दिया।

बिना भेदभाव करते थे शासन
महाराजा छत्रसाल का जन्म 1706 में बुंदेल राजवंश के महारजा चंपतराय के यहां हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद उनका लालन पालन माता लालकुंवारी ने किया था। उन्होंने ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए जंगलों में रहकर पन्ना राज की स्थापना की थी।

पन्ना राज्य में कुल 14 राजाओं ने शासन किया था, लेकिन धत्रसाल सबसे अलग थे। वे बिना भेदभाव हर वर्ग के साथ न्याय करते थे। उनकी फौज में हिन्दू मुस्लमान दौनों ने बढ़चढ़कर भाग लिया। और उनकी मेना में अनेक जाति मत और संप्रदाय के लोग भाईचारे रहते थे। जब मातृभूमि की रक्षा की बात आती, तो सब कंधे से कंधा मिलाकर बलिदान के लिए तैयाररणभूमि में दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए तैयार रहते थे। छत्रसाल ने अपने जीवनकाल में 22 लड़ाईयां लड़ी और किसी में पराजय का स्वाद नहीं चखा।

वो चमत्कारी तलवार जो गुरू ने भेंट की
जब छत्रसाल की मुलाकात महामती धर्म के प्रणेता प्राणनाथ जी से हुई थी। तो उन्होंने छत्रसाल के अदम्य साहस और प्रताप को देखते हुए उन्हें अशीष प्रदान किया। महामति प्राणनाथ जी ने पन्ना शहर के नजदीक खेजड़ा मंदिर में एक चमत्कारी तलवार भी भेंट की थी। और इस परंपरा का आज भी निर्वाहन महारज के वंशज आज भी इस परंपरा का बखूभी निभाते हैं, और प्रणामी धर्म के धर्मगुरू पन्ना महाराज को तलवार भेंट करते हैं।

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