13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सिंधिया के आने से बौना हो जाएगा कई भाजपा नेताओं का कद

- इम्पैक्ट ऑफ सिंधिया : बदल सकती है ग्वालियर-चंबल, मालवा और बुंदेलखंड की सियासी तस्वीर

4 min read
Google source verification
scindia3_1.jpg

scindia3_1.jpg

भोपाल. पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से प्रदेश के सियासी समीकरण उलट-पुलट हो गए हैं। सिंधिया के सामने भाजपा में दिग्गजों के कद भी बौने साबित होंंगे, तो दूसरी ओर कांग्रेस अनेक जिलों में लगभग खाली हो जाएगी। अब कांग्रेस को इन जिलों में संगठन पूरी तरह रिफार्म करना होगा। जानिए, सिंधिया इम्पैक्ट को दोनों पार्टियों में...

कांग्रेस : कई जिले हो जाएंगे खाली
सिंधिया का सबसे ज्यादा असर ग्वालियर-चंबल, मालवा और बुंदेलखंड अंचल में है। ग्वालियर-चंबल में तो पूरा संगठन सिंधिया के इर्द-गिर्द घूमता था। इन तीनों अंचलों में इस्तीफों का दौर चल पड़ा है। ग्वालियर, गुना, अशोकनगर, शिवपुरी सहित अनेक जिलों के अध्यक्ष सहित अन्य संगठन पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए हैं। पिछले चार दशकों से इन इलाकों की सियासत में सिंधिया परिवार के अलावा कोई पनप नहीं सका। कांग्रेस संगठन यहां सिंधिया केंद्रित होकर रह गया। बुंदेलखंड में सिंधिया के खास समर्थक मंत्री गोविंद सिंह राजपूत बड़ा केंद्र बिंदु रहे हैं, जबकि इंदौर में तुलसी सिलावट सहित अन्य नेता है। इन अंचलों के पांच दर्जन जिलों में कांग्रेस को नए सिरे से संगठन बनाने के साथ दोहरी चुनौती से जूझना होगा। पहली चुनौती भाजपा से निपटने की, तो दूसरी उससे भी ज्यादा सिंधिया खेमे से निपटने की। ऐसे में कांग्रेस के लिए इन अंचलों के जिलों में पैठ बनाना पहले से कई गुना मुश्किल हो जाएगा। युवा कांग्रेस से लेकर मुख्य संगठन तक सिंधिया समर्थक भरे पड़े हैं। इनमें से अनेक पद छोड़ चुके हैं, जो अभी पार्टी नहीं छोड़ पाए हैं, उनसे निपटना भी कांग्रेस संगठन के लिए आसान नहीं है। तीनों अंचलों में कांग्रेस को बड़े रिफार्म से गुजरने के हालात बन गए हैं।

- अब सिंधिया वर्सेस कमलनाथ-दिग्विजय
प्रदेश में सिंधिया की सीधे तौर पर मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह से सियासी लड़ाई शुरू हो जाएगी। इससे पहले भी पार्टी में सिंधिया का अलग खेमा था, लेकिन उन्हें कमलनाथ और दिग्विजय के साथ नजर आना पड़ता था। अब भाजपा की रणनीति भी कमलनाथ और दिग्विजय से टकराव के लिए सिंधिया के चेहरे को ही आगे करने की रहेगी। इस स्थिति में यदि प्रदेश में चुनाव होते हैं तो और नहीं होते हैं तब भी सिंधिया ही भाजपा की ओर से बड़ा चेहरा हो सकते हैं।

- भाजपा : नई अंतर्कलह और घटेगा दिग्गजों का कद
सिंधिया के आने के बाद भाजपा में नई अंतर्कलह शुरू हो जाएगी। सिंधिया के साथ छह मंत्री सहित 22 विधायक आएंगे। इनके आने से इन 22 विधानसभा सीटों पर भाजपा के जमे हुए नेताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो जाएगा। वहीं, सिंधिया के साथ सैकड़ों समर्थक आएंगे। इनसे भी सीधे तौर पर 15 से 20 विधानसभा सीटें प्रभावित होंगी। भाजपा के लिए आगे चलकर अंदरूनी हालात संभालना बड़ी चुनौती साबित होगा। दूसरी ओर भाजपा के दिग्गजों के कद पर भी असर होगा।


- ऐसे समझें दिग्गजों पर असर
नरेंद्र सिंह तोमर : ग्वालियर-चंबल के दिग्गज नेता व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सामने सिंधिया बड़ी चुनौती बनकर उभरेंगे। तोमर अभी अंचल के सबसे बड़े नेता हैं। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से लेकर अन्य सभी मामलों में तोमर का नाम आगे रहता है, लेकिन सिंधिया के आने के बाद समीकरण बदलेंगे। तोमर का कद कम हो सकता है।
शिवराज सिंह चौहान : पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के कद पर भी सिंधिया के आने का असर होगा। अभी प्रदेश के नेता के तौर पर शिवराज सबसे बड़ा चेहरा है, लेकिन सिंधिया के चेहरे के आने से प्रदेश में दूसरा बड़ा चेहरा खड़ा हो गया है। दरअसल, शिवराज की तरह सिंधिया भी जनता में लोकप्रिय हैं। युवाओं में भी उनका क्रेज है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने नारा दिया था कि 'माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराजÓ, लेकिन अब इस नारे के मायने ही बदल गए हैं। शिवराज खुद अब सिंधिया के सामने राजनीतिक तौर पर छोटे साबित हो सकते हैं।

प्रभात झा : भाजपा उपाध्यक्ष प्रभात झा ने हमेशा सिंधिया को घेरने के प्रयास किए। इसके लिए प्रभात ने सिंधिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से लेकर सियासी हमले तक किए, लेकिन सिंधिया ने कभी भी प्रभात झा को अपने कद का नेता नहीं माना और जवाब तक नहीं दिए। सिंधिया हमेशा प्रभात को अपने पूर्वजों का खिदमतगार मानते आए हैं, इसलिए अब सिंधिया के आने के बाद अब प्रभात झा का कद बेहद छोटा हो जाएगा।
यशोधरा राजे सिंधिया : भाजपा नेता व पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया के कद पर भी सिंधिया की एंट्री का असर पड़ेगा। यशोधरा उनकी बुआ हैं। यशोधरा ने ज्योतिरादित्य के फैसले का स्वागत भी किया है, लेकिन आगे चलकर ग्वालियर-चंबल में सिंधिया घराने में पहला नाम ज्योतिरादित्य हो जाएंगे। इसका यशोधरा के राजनीतिक रसूख से लेकर पार्टीगत महत्त्व तक पर असर पड़ेगा। शिवराज के कार्यकाल में भी यशोधरा लूपलाइन में ही रही हंै। अब ज्योतिरादित्य के आने से उन पर और असर पड़ेगा।
जयभान सिंह पवैया : पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया की पूरी राजनीति ज्योतिरादित्य सिंधिया के विरोध पर ही टिकी रही है। पहले जयभान ने ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया का विरोध किया, फिर उनकी मृत्यु के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया का खुलेआम विरोध किया। सियासत में सिंधिया को लेकर सबसे कड़वे बोल और विरोध जयभान ने ही किया, जबकि ज्योतिरादित्य ने अधिकतर जयभान को रिस्पांस ही नहीं दिया। अब ज्योतिरादित्य के भाजपा में आने की स्थिति में जयभान के लिए अस्तित्व का संकट हो जाएगा।
नरोत्तम मिश्रा : पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का कद पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। इसके चलते नरेंद्र सिंह तोमर के बाद नरोत्तम दूसरे नंबर के ग्वालियर-चंबल के नेता के तौर पर एक धड़े में माने जाने लगे थे, लेकिन सिंधिया की भाजपा में एंट्री नरोत्तम के बढुते कद व खेमे पर अंकुश लगा सकता है। सिंधिया अब ग्वालियर-चंबल और प्रदेश की सियासत के सबसे बड़े चेहरे हो जाएंगे।