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वर्ल्ड डांस डे : युवा भी डांस से पहचान और करियर बनाने का कर रहे प्रयास

शास्त्रीय नृत्य में फ्यूजन कर दिए नए आयाम

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भोपाल। शास्त्रीय नृत्य देश की हजारों साल की परंपरा रही है, लेकिन इसे करियर के रूप में कम ही देखा गया। लेकिन अब शहर का यूथ अब परिवार का विरोध सहकर भी डांस को ही अपना करियर बना रहा है। इधर गुरु भी समय के साथ शास्त्रीय नृत्य में नए-नए प्रयोग कर युवाओं को इंस्पायर कर रहे हैं। कोई कविता पर कथक कर रहा है तो कोई फोक पर भरतनाट्यम कर डांस को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की कोशिश कर रहा है। चलिए वल्र्ड डांस डे पर जानते हैं ऐसे ही कुछ उदाहरणों से।

हिन्दी संगीत पर किया भरतनाट्यम

ख्यात भरतनाट्यम नृत्यागंना लता मुंशी ने चार साल की उम्र से नृत्य की शिक्षा लेना शुरू की। आमतौर पर भरतनाट्यम की प्रस्तुति कर्नाटक संगीत पर होती है। लता हिन्दी बेल्ट में परफॉर्म करती थीं। दर्शकों को संगीत और नृत्य से जोडऩे के लिए उन्होंने हिन्दी संगीत को शास्त्रीयता से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने भारत के विभिन्न राज्य और खंडों में गाए जाने वाले फोक गानों पर भी नृत्य का फ्यूजन पेश किया। उन्होंने भक्ति रस के कवियों की रचनाओं पर स्टोरी तैयार कर नृत्य नाटिका भी तैयार कीं। वे पिछले चालीस सालों से नृत्य शिक्षा दे रही हैं।

टैगोर की रचनाओं पर किया कथक

कथक की ख्यात नृत्यागंना विजया शर्मा 40 सालों ने नृत्य की साधना कर रही हैं। उन्होंने 1990 में पहली बार ध्रुपद गायन पर शास्त्रीय नृत्य पेश किया था। उस वक्त ये काफी नया प्रयोग माना जाता था। इसके बाद उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर की 18 कविताओं पर ‘काव्यरंग’ पेश किया। उन्होंने लोकभाषाओं में बुंदेलखंडी लोकगायन में कथक का फ्यूजन किया तो मराठी गीत रामायण को कथक शैली में पिरोया। माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, निराला से लेकर कई जायासी, कालीदास तक की रचनाओं को कथक के माध्यम से भाव रूप दिया।

छाऊ-बैले का फ्यूजन

उड़ीसा के मयूरभंज जिले के रहने वाले चंद्रमाधव बारिक ने चार साल की उम्र से छाऊ नृत्य सीखना शुरू किया। 1979 में ग्वालियर में लिटिल बैले ग्रुप से जुड़ गए। वहां छाऊ के साथ बैले डांस सीखा। इसके बाद उन्होंने दोनों के फ्यूजन को मंच पर उतारना शुरू किया। वे 1986 से नृत्य में विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं। वे दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स भी कोरियोग्राफी कर चुके हैं।

विदेशों में भी प्रस्तुति

आरोही मुंशी अब तक इटली, फ्रांस, कनाडा, सिंगापुर आस्ट्रेलिया सहित कई देशों में भरतनाट्यम की प्रस्तुति दे चुकी हैं। आरोही का कहना है कि पहले भरतनाट्यम को सिर्फ सीख रही थी। हायर स्टडी के लिए चार साल तक डांस से दूर रही थी तो इसकी अहमियत पता चली। अब डांस से ही पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हूं। स्पंदन सम्मान सहित मलेशिया में नृत्य रत्नाकर पुरस्कार मिल चुका है।

इंटरनेशनल लेवल पर करना है देश का नाम

करीब 14 सालों से भरतनाट्यम डांस कर रहीं 21 वर्षीय रिया झा देशभर के विभिन्न शहरों और प्रतियोगिताओं में परफॉर्म कर चुकी हैं और पुरस्कार जीत चुकी हैं। उनकी मुख्य परफॉर्मेंस में आइसीसीआर दिल्ली, लोकरंग समारोह, मीरा समारोह, भारत भवन वर्षगांठ समारोह खास रहे हैं।

इसके अतिरिक्त आइआइटी इंदौर के एनुअल फेस्ट में भी वे लगातार दो सालों तक सेकंड पोजिशन पर रहीं। वे कहती हैं कि जब सात साल की उम्र में भरतनाट्यम की शुरुआत की तो करियर के बारे में नहीं सोचा था पर इंट्रेस्ट और परिवार के सपोर्ट के कारण इसे लगातार जारी रख पाई। अब इसमें इंटरनेशनल लेवल पर अपने देश, परिवार और गुरु लता मुंशी जी का नाम करना चाहती हूं।