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एनजीटी ने शासन को फिर दिए नई डेयरी पॉलिसी बनाने के निर्देश, तीन साल में भी पॉलिसी पेश नहीं कर पाया शासन

जबलपुर में नर्मदा, गौर और परियट नदियों का पानी डेयरियों के कारण हो रहा प्रदूषित, एनजीटी के निर्देश के बावजूद नहीं हो पाई इनकी शिफ्टिंग

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भोपाल

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Sunil Mishra

Jul 06, 2020

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भोपाल। एनजीटी ने एक बार फिर मप्र शासन को डेयरियों से संबंधित पॉलिसी बनाकर पेश करने के निर्देश दिए हैं। जबलपुर में नर्मदा, गौर और परियट नदी किनारे स्थित डेयरियों की शिफ्टिंग नहीं होने पर ट्रिब्यूनल ने अप्रसन्नता व्यक्त की। एनजीटी ने कहा कि वर्ष 2017-18 में आदेश होने के बावजूद अभी तक पॉलिसी नहीं बनाई गई, अब बहुत देर हो चुकी है, जल्द पॉलिसी बनाएं और उसके अनुरूप डेयरियों को शिफ्ट कराएं। डेयरियों की नदियों से दूरी और इनके डिस्पोजल की भी समुचित व्यवस्था करें। इससे नागरिकों को राहत मिलेगी।

एनजीटी सेंट्रल जोनल बेंच ने सोमवार को नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच सहित डेयरी विस्थापन के संबंध में लगी 16 याचिकाओं पर एक साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई की। वर्ष 2017 में जबलपुर की इन डेयरियों के विस्थापन का मामला हाईकोर्ट से एनजीटी में सुनवाई के लिए भेजा गया था क्योंकि यह पर्यावरण से संबंधित मामला था। इसके बाद वर्ष 2017 में ही एनजीटी ने तीनों नदियों में बढ रहे प्रदूषण को देखते हुए इसके किनारे स्थापित डेयरियों को शिफ्ट करने के निर्देश राज्य शासन को दिए थे। इसके बाद राज्य शासन ने कहा था कि इस संबंध में एक पॉलिसी बनाई जाएगी उसके अनुसार इन्हें शिफ्ट किया जाएगा, इसमें 6 माह का समय लगेगा। 9 जनवरी 2018 को हुई सुनवाई में शासन की ओर से उनके एडवोकेट ने अगली सुनवाई में शासन की डेयरी पॉलिसी पेश करने की बात कही थी। इसके बाद एनजीटी की ओर से मप्र के मुख्य सचिव को तीन बार रिमाइंडर भी भेजे गए लेकिन अभी तक डेयरी पॉलिसी नहीं बन पाई। सोमवार को हुई सुनवाई में मप्र शासन यह पॉलिसी पेश नहीं कर पाया जिस पर ट्रिब्यूनल ने अप्रसन्नता व्यक्त की। सुनवाई के दौरान डेयरी संचालकों ने भी बताया कि उनके लिए अभी तक शहर के बाहर जमीन और अधोसंरचना की व्यवस्था नहीं हो पाई है तो ऐसे में वे शिफ्ट कैसे कर सकते हैं।

डेयरियों की नदियों से दूरी और उसके अपशिष्ट के संबंध में नियम बनाने के निर्देश

एनजीटी ने राज्य शासन से कहा है कि पॉलिसी में डेयरियों की नदियों से दूरी तय करें। इतनी दूरी तय करें जिससे डेयरियों से निकलने वाले अपशिष्ट नदियों में नहीं मिल सकें। इसके साथ डेयरियों की क्षमता के अनुसार ईटीपी और एसटीपी प्लांट बनाना भी अनिवार्य किया जाए। इससे उससे निकलने वाला तरल अपशिष्ट भी साफ होकर ही बाहर जाएगा। इससे बाहर लोगों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी।

यह है मामला

वर्ष 1998 में डॉ. पीजी नाजपांडे ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि जबलपुर शहर में स्थित 299 डेयरियों की वजह से वातावरण बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। नर्मदा, परियट और गौर नदियों के किनारे स्थित डेयरियों से निकलने वाले गोबर और मूत्र ने इन नदियों को गोबर की नदी बना दिया है। नदियों में पशुओं को भी नहलाया जा रहा है जिससे उनका पानी प्रदूषित हो रहा है। मामले की करीब 19 साल चली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी डेयरियों को नगर निगम सीमा से बाहर किए जाने सहित डेयरियों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने के निर्देश दिए थे लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। बाद में एनजीटी ने भी इन डेयरियों को शहर से बाहर करने और बड़ी डेयरियों में ईटीपी और छोटी में एसटीपी बनाने के निर्देश दिए थे। एनजीटी ने यह भी कहा था कि यदि छोटे डेयरी संचालक अकेले एसटीपी नहीं बनवा पा रहे हैं तो कई डेयरियां मिलकर भी बनवा सकती हैं। लेकिन शासन-प्रशासन यह भी नहीं करा पाया।