जन्म से ही दुर्लभ हृदय रोग से जूझ रहे थे तीनों बच्चे, कई अस्पतालों के लगा चुके थे चक्कर, एम्स भोपाल में हुआ सफल इलाज
एम्स भोपाल में दुर्लभ हार्ट डिसीज से जूझ रहे तीन बच्चों का विशेष धातु नितिनोल से बने स्टेंट को लगाकर जान बचाई गई है। इन तीनों प्रक्रिया की खास बात यह कि इसमें बच्चों के दिल की सर्जरी करने की जरूरत नहीं पड़ी। सबसे पहले 6 किलो की एक साल की बच्ची जिसे सांस लेने में दिक्कत और दूध तक नहीं पी पाती थी। उसमें बटन जैसे नितिनोल डिवाइस को ह्रदय तक पहुंचा कर दिल के छेद को बंद किया गया। जिससे बच्ची में समस्या का निदान हुआ।
इसी तरह तीन साल के बच्चे के दिल में 25 मिमी का छेद था। इसमें भई परक्यूटेनियस ट्रांसकैथेटर डिवाइस क्लोजर के लिए 28 मिमी बटन जैसे नाइटिनोल डिवाइस को लगाया गया। वहीं अंत में 12 साल के बच्चे को सांस लेने में तकलीफ और उसका ऑक्सीजन लेवल 60 फीसदी तक आ गया था। इसका भी वैस्कुलर प्लग डिवाइस लगाकर बिना चीर-फाड़ के दिल का इलाज किया गया। प्रक्रिया के बाद ऑक्सीजन लेवल 95 फीसदी पर आ गया था।
डॉक्टरों की टीम
कार्डियोलॉजी विभाग - डॉ. भूषण शाह, डॉ. अंबर कुमार, डॉ. किसलय श्रीवास्तव और डॉ. मधुर जैन
कार्डियक एनेस्थीसिया - डॉ. वैशाली वेंडेस्कर और डॉ. एसआरएएन भूषणम पडाला
सीटीवीएस - डॉ. योगेश निवारिया और डॉ. एम किसान
एम्स भोपाल को पहली बार मिला कायाकल्प पुरस्कार
भोपाल. एम्स भोपाल अकेला बी ग्रुप का ऐसा अस्पताल है जिसे पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रुपए की राशि मिली है। इसके साथ ही यह पहली बार है कि एम्स भोपाल को कायाकल्प पुरस्कार के तहत एक करोड़ से सम्मानित किया गया है। कायाकल्प पुरस्कार, स्वच्छता और मरीज देखभाल को नियमों के अनुसार करने पर प्रदान किया जाता है। एम्स के निदेशक डॉ. अजय सिंह ने इस उपलब्धि के लिए आभार व्यक्त करते हुए इसका श्रेय अस्पताल के प्रत्येक सदस्य के सहयोगात्मक प्रयासों को दिया। कायाकल्प पुरस्कार स्वच्छ भारत अभियान (स्वच्छ भारत मिशन) के हिस्से के रूप में भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा स्थापित किया गया है। इस पुरस्कार का उद्देश्य पूरे भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में स्वच्छता, स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण प्रथाओं को बढ़ावा देना है।