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सीजफायर के बाद लौट रहे भारतीय सैनिकों पर पाकिस्तान ने प्लेन से किया था हमला, हमारी एयर स्ट्राइक देख भाग खड़े हुए

विजय दिवस के अवसर 1971 युद्ध के वीर योद्धाओं ने साझा किए अपने अनुभव

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सीजफायर के बाद लौट रहे भारतीय सैनिकों पर पाकिस्तान ने प्लेन से किया था हमला, हमारी एयर स्ट्राइक देख भाग खड़े हुए

सीजफायर के बाद लौट रहे भारतीय सैनिकों पर पाकिस्तान ने प्लेन से किया था हमला, हमारी एयर स्ट्राइक देख भाग खड़े हुए

भोपाल। शौर्य स्मारक में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के विजय दिवस पर अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि भारत न पहले कमजोर था और न ही आज कमजोर है। हम सब को यह याद रखना चाहिए कि सभी नागरिकों को, चाहे वे किसी भी मजहब, जाति अथवा पंथ को मानने वाले हों, सबका यह कर्तव्य है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत बनाएं।

अपने शहीदों का गुणगान करें। उन्होंने कहा कि 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध एक सैन्य संघर्ष था। यह संघर्ष 3 दिसंबर 1971 को शुरू हुआ और 16 दिसंबर को ढाका में पाक सेना के समर्पण के साथ समाप्त हुआ। उन्होंने कहा कि उस समय के अधिकांश पश्चिमी देश और महाशक्ति अमेरिका भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध कुछ नहीं करने के लिए खुलेआम धमका रहे थे।

1971 की इस जीत ने भारत को एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया। इससे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पूरे विश्व में दृढ़ता के साथ निर्णय लेने वाली आयरन लेडी के रूप में पहचान मिली। इस मौके पर सीएम ने सैन्य अधिकारी व जवानों को सम्मानित किया गया।


पाकिस्तान ने की थी नापाक हरकत

उन दिनों मैं 1-कोर सिग्नल रेजिमेंट में सिपाही के पद पर सांबा सेक्टर में पदस्थ था। हमारी टीम का काम कम्युनिकेशन सिस्टम को बनाए रखना था हमें दुश्मन की फायरिंग से बचने के लिए गड्डों में छिपे रहना पड़ता था। सीजफायर की घोषणा के बाद कानवाई में गाडिय़ां वापस लौट रही थी। शाम के करीब 5.30 बजे का समय था। तभी पाकिस्तानी एयरफोर्स के 5 विमानों ने हमला कर दिया। इसमें हमारे कई साथी मारे गए। जैसे ही पाक एयरफोर्स को पठानकोट एयरबेस से उड़े 15 विमान उडऩे की सूचना मिली वे भाग खड़े हुए।
कैप्टन जेएन प्रसाद

आर्मी ज्वाइन करने के 18 दिन बाद ही लड़ा पहला युद्ध

1971 युद्ध शुरू होने से महज 18 दिन पहले ही मुझे कमिशन मिला था। बतौर सेकंड लेफ्टिनेंट मैंने आर्मी ज्वॉइन ही की थी। युद्ध को देखते हुए हमारी स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग को स्थगित कर दिया गया। मुझे छम सेक्टर में पोस्टिंग मिली थी। मैं वहां आर्मड कोर में था। छम गांव के पास मनावर तवी नदी के पश्चि में हमें पाकिस्तान सीमा को रोकने का टारगेट दिया गया था। क्योंकि पाकिस्तान की सेना यहां से हमारे देश में दाखिल होने की कोशिश में थी। पाकिस्तान ने हमारे ट्रूप पर टैंकों से हमला किया। हमने उनके 34 टैंक नष्ट कर दिए, हमें 9 टैंक पाक सेना ने उड़ा दिए। इस युद्ध में हमारे 50 से ज्यादा साथी शहीद हो गए। हमने शहीद साथियों का वहीं अंतिम संस्कार भी किया।
कैप्टन प्रवीण डाबर

मेरी पोस्टिंग 33 कोर, 11 इंजीनियरिंग में बतौर कैप्टन थी। हम बांग्लादेश बॉर्डर पर पच्छागढ़ ठाकुर गांव में मोर्चा संभाले हुए थे। युद्ध से पहले ही हमें बीएसएफ के साथ सिविल ड्रेस में छिपकर सर्चिंग का टास्क मिला था। हमने बांग्लादेश के अंदरूनी इलाकों में जाकर रैकी की। हमने ये पता लगाया कि पाकिस्तान ने कहां पर एंटी टैंक और एंटी पर्सन बारूदी सुरंग बिछाई है। हमने उनकी योजनाओं को समय रहते फेल कर दिया, इससे हमारी फोर्स को नुकसान कम हुआ। हालांकि बारूदी सुरंग निकालने में हमारे कई साथी घायल हुए।
कर्नल एकेएस परमार

युद्ध के दौरान मैं कॉर्पोरल के पद पर था। हमें मुंबई की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिली थी। हमारी टीम मड आइलैंड पर तैनात थी। युद्ध के दौरान पाकिस्तान एयरफोर्स के पांच से ज्यादा विमानों ने बम गिराने की कोशिश की, हमने अंब्ररेला फायर कर उनके प्लेन को नीचे की ओर नहीं आने दिया, क्योंकि प्लेन को बम गिराने के लिए काफी कम ऊंचाई पर आना पड़ता है। इसके बाद हमें सूचना दी गई कि अमेरिका ने अपना बेड़ा भेजा है। हमें दूसरी ओर मोर्चा संभालने के लिए चित्ते गांव ईस्ट पर भेजा गया।

कर्नल मनमोहन दत्ता