
भोपाल। प्रदेश में बिना प्रमोशन के सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों व अधिकारियों की बढ़ती संख्या के कारण सरकार ने अब प्रमोशन में आरक्षण मुद्दे पर हल निकालने के लिए नया कदम उठाया है। सरकार ने अब जीएडी मंत्री डा. गोविंद सिंह की अध्यक्षता में एक अलग कमेटी बनाना तय किया है। इस कमेटी में विधि विभाग के प्रमुख सचिव और राज्य के महाधिवक्ता को भी शामिल किया जाएगा। यह कमेटी अपनी रिपोर्ट देगी कि प्रमोशन में आरक्षण को लेकर क्या फार्मूला अपनाना चाहिए, जिससे अटके प्रमोशन का रास्ता खुल सके।
दरअसल, मार्च 2020 में थोकबंद कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति होना है। इस कारण सरकार ने कर्मचारियों के हित में इस ओर फोकस करना तय किया गा है। इसके चलते कमेटी को गठित करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री कमलनाथ को भेज दिया गया है। इस कमेटी में मंत्री, विधि पीएस और महाधिवक्ता के अलावा जीएडी के अपर मुख्य सचिव को रखना भी तय किया गया है। कमेटी के लिए टाइम-लाइन भी तय होगी, ताकि निश्चित समयावधि में वह रिपोर्ट दे सके।
पूर्व कमेटी अभी पाइपलाइन में
दरअसल, इसके पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने एक कमेटी प्रमोशन में आरक्षण पर गठित करने का ऐलान किया था, लेकिन अभी तक उसका आदेश नहीं निकला है। उक्त कमेटी में विधानसभा अध्यक्ष के अलावा मुख्यमंत्री कमलनाथ व जीएडी मंत्री गोविंद सिंह और कांग्रेस व भाजपा से चार-चार विधायक शामिल होना प्रस्तावित है। विधानसभा अध्यक्ष ने जुलाई के मानसून सत्र में इस कमेटी के गठन का ऐलान किया था।
सुप्रीमकोर्ट के पेंच में उलझा प्रकरण-
प्रमोशन में आरक्षण का पूरा मामला सुप्रीमकोर्ट में केस चलने के पेंच में उलझ गया है। सरकार ने इस मामले में पहले राज्य स्तर पर नियम बनाकर सशर्त प्रमोशन देने की तैयारी की थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। विधि विभाग से इस पर मंजूरी नहीं मिल सकी, जिसके कारण यह मामला अटका गया। इसके बाद तय नहीं हो सका कि इस मामले में क्या कदम उठाए जाए। जुलाई में जब यह मुद्दा विधानसभा में गूंजा, तो विधानसभा अध्यक्ष की कमेटी और अब जीएडी मंत्री की कमेटी गठित करने के कदम उठाए गए हैं।
ये है मामला
मध्यप्रदेश में वर्ष-2002 में प्रमोशन में आरक्षण के लिए नियम लागू किए थे। इसके तहत नौकरी में भर्ती और फिर प्रमोशन में भी आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई। तब, कोर्ट में इस नियम को चुनौती दी गई कि भर्ती में जब आरक्षण मिल गया, तो फिर प्रमोशन में आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
इस पर 2016 में जबलपुर हाईकोर्ट ने इस नियम को रद्द कर दिया था। इस पर बवाल मचा, तो तत्कालीन शिवराज सरकार सुप्रीमकोर्ट चली गई। सुप्रीमकोर्ट ने बाद में इस मामले में स्थिति को यथावत रखने के आदेश दिए। तब से ही मामला अटका हुआ है। अधिकारी व कर्मचारी बिना प्रमोशन सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिसके चलते असंतोष बढ़ रहा है।
Published on:
23 Nov 2019 09:50 am
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