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भोपाल। राजधानी समेत प्रदेश और देशभर में आज ऋषि पंचमी का आयोजन किया जा रहा है। महिलाओं ने सप्त ऋषि का पूजन कर व्रत प्रारंभ किया है। मान्यता है कि ये व्रत करने से स्त्री और पुरुष दोनों के हर पाप आसानी से क्षमा कर दिए जाते हैं। जानें ऋषि पंचमी व्रत से जुड़े ये रोचक फैक्ट...
* शास्त्रों में भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्त ऋषि पूजन व्रत का विधान है।
* इस वर्ष यह पर्व 26 अगस्त शनिवार को मनाया जा रहा है।
* ब्रह्म पुराण के अनुसार इस दिन चारों वर्ण की स्त्रियों को यह व्रत पूरी श्रद्धा से करना चाहिए।
* यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों के पक्षालन के लिए स्त्री तथा पुरुषों को अवश्य करना चाहिए।
ऐसे किया जाता है व्रत
* इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व रहता है। पर ऐसा कर पाना सभी के लिए संभव नहीं है। ऐसे में आप सुबह दैनिक कर्मों से निपटकर स्नानादि करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें।
* इसके बाद घर में ही किसी पवित्र स्थान पर पृथ्वी को शुद्ध करके हल्दी से चौक पूरें। अब इस पर सप्त ऋषियों की स्थापना करें।
* इसके बाद गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सप्तर्षियों का पूजन करें।
इस मंत्र का जाप करें...
'कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:॥
दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्नणन्त्वघ्र्यं नमो नम:॥
ये मंत्र व्रत को फलदायी बनाता है।
* अब व्रत कथा सुनकर आरती कर प्रसाद वितरित करें।
* इसके बाद बिना बोई हुई पृथ्वी में पैदा हुए शाकादि का आहार लें।
* इस व्रत को सात वर्ष तक करें।
* आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की सात मूर्तियां बनवाएं।
* इसके बाद कलश स्थापन करके यथाविधि पूजन करें।
* अंत में सात गोदान तथा सात युग्मक-ब्राह्मण को भोजन करा कर उनका विसर्जन कर, व्रत का उद्यापन संपन्न करें।
* इस संबंध में यह भी मान्यता है कि भारत के कहीं-कहीं दूसरे स्थानों पर, किसी प्रांत में महिलाएं पंचताडी तृण एवं भाई के दिए हुए चावल कौवे आदि को देकर फिर स्वयं भोजन करती है।
ये है कथा का सार
एक समय राजा सिताश्व धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से ब्रह्मा जी के पास गए और उनके चरणों में शीश नवाकर बोले- हे आदिदेव! आप समस्त धर्मों के प्रवर्तक और गुढ़ धर्मों को जानने वाले हैं। आपके श्री मुख से धर्म चर्चा श्रवण कर मन को आत्मिक शांति मिलती है। भगवान के चरण कमलों में प्रीति बढ़ती है। वैसे तो आपने मुझे नाना प्रकार के व्रतों के बारे में उपदेश दिए हैं। अब मैं आपके मुखारविन्द से उस श्रेष्ठ व्रत को सुनने की अभिलाषा रखता हूं, जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है।
राजा के वचन को सुन कर ब्रह्माजी ने कहा- हे श्रेष्ठ, तुम्हारा प्रश्न अति उत्तम और धर्म में प्रीति बढ़ाने वाला है। मैं तुम्हें समस्त पापों को नष्ट करने वाले सर्वोत्तम व्रत के बारे में बताता हूं। यह व्रत ऋषि पंचमी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने वाला प्राणी अपने समस्त पापों से सहज छुटकारा पा लेता है।
ऐसे कहें कथा
विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे। एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा-प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की ऐसी दुर्गति होने का क्या कारण है?
उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।
धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्तहो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।
Updated on:
26 Aug 2017 01:00 pm
Published on:
26 Aug 2017 12:38 pm
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