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स्वच्छता पखवाड़ा 2018 : हाथ मिलाने की जगह हाथ जोड़कर करें नमस्ते बीमारियों से दूर रखती है नमस्कार की परम्परा

स्वच्छता पखवाड़ा 2018 पर मानव संग्रहालय में विशेष व्याख्यान

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भोपाल। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में गुरुवार को मानव संग्रहालय के 'स्वच्छता पखवाड़ा 2018' के अंतर्गत विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें कर्नल (डॉ.) महेंद्र सिंह ने स्वच्छता एवं स्वास्थ्य विषय पर कहा कि जिस तरह आप पारंपरिक संस्कृति को सहेजते हुए नवीन संस्कृति को आत्मसात करते हुए जीवन निर्वाह कर रहे हैं, उसी प्रकार परंपरा से चले आ रहे स्वस्थ रहने के तौर तरीके वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं।

स्वच्छता एवं स्वस्थ रहने के तरीकों में काफी बदलाव आया है और इस बदलाव के चलते हमें कई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।सफाई के लिए विचार करने की जरूरत है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बना कर चलें तो हमें ही फायदा होगा। अधिकतर बीमारी हाथों के माध्यम से ही फैलती है, इसीलिए हमारे पूर्वज अभिवादन करने हेतु दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करते थे ताकि बैक्टिरिया और वायरस एक दूसरे के बीच ना फैलें।

लोगों को साफ-सफाई के व्यवहारिक ज्ञान को सुदृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए। फील्ड में काम के साथ-साथ स्वस्थ रहने के बारे में भी बातचीत करनी चाहिए।

नमस्कार के फायदे

डॉ. आदर्श वाजपेयी के अनुसार नमस्कार या प्रणाम करना एक सम्मान है, एक संस्कार है। प्रणाम करना एक यौगिक प्रक्रिया भी है। बड़ों को हाथ जोड़कर प्रणाम करने का वैज्ञानिक महत्व भी है। नमस्कार मन, वचन और शरीर तीनों में से किसी एक के माध्यम से किया जाता है। हमारे हाथ के तंतु मस्तिष्क के तंतुओं से जुड़े हैं। नमस्कार करते वक्त हथेलियों को दबाने से या जोड़े रखने से हृदयचक्र और आज्ञाचक्र में सक्रियता आती है जिससे मन जागृत होता है।

जागरण से मन शांत और चित्त में प्रसन्नता आती है। साथ ही हृदय में पुष्टता आती है तथा निर्भिकता बढ़ती है। भारत में हाथ जोड़कर नमस्कार करना एक मनोवैज्ञानिक पद्धति है। हाथ जोड़कर आप जोर से बोल नहीं सकते, अधिक क्रोध नहीं कर सकते और भाग नहीं सकते। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें एक मनोवैज्ञानिक दबाव होता है।

करो और सीखो वर्कशॉप

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में बच्चों, गृहणियों और विद्यार्थियों के लिए एजुकेशनल वर्कशॉप 'करो और सीखो' का आयोजन शुक्रवार से किया जाएगा। इसमें पारंपरिक और राष्ट्रीय ख्याति के कलाकारों के सान्निध्य में देश के विविध शिल्प रुपों से परिचित होने का मौका मिलेगा।

इस वर्ष गुजरात की राठवा भित्ति चित्रकला, मणिपुर की गुडिय़ा निर्माण तथा ब्लॉक प्रिंट कला, वारली चित्रकला एवं ओडिशा के धानशिल्प के अतिरिक्त 8 से 14 वर्ष आयु समूह के बच्चों हेतु कच्छ, गुजरात की चित्रित पॉटरी पर भी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।

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