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बच्चों में पसर रही ये खौफनाक बीमारी, भोपाल के एक ही अस्पताल में पहुंचे 50 प्रभावित, एडवाइजरी जारी

Diarrhea - हमीदिया में मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा, बच्चों में डायरिया के लक्षण, तेज गर्मी से ओपीडी में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़े

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Diarrhea - भोपाल में तापमान में जबर्दस्त बढोत्तरी होने का असर अस्पतालों में नजर आने लगा है। इसके चलते हीट स्ट्रोक के मरीजों में तेजी से इजाफा हो रहा है। जेपी एवं हमीदिया अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन दर्ज होने वाले प्रकरणों में बच्चों की संख्या सर्वाधिक देखी जा रही है। बच्चों में हीट स्ट्रोक के चलते उल्टी दस्त के लक्षण देखने मिल रहे हैं। हमीदिया अस्पताल में ही डायरिया जैसी खौफनाक बीमारी से ग्रस्त करीब 50 बच्चे पहुंचे। इसे तेजी से बढ़ते देख स्वास्थ्य विभाग ने बाकायदा एडवाइजरी जारी कर दी है। इसमें बच्चों को ओआरएस का घोल पिलाने की हिदायत दी गई है। लोगों को अधिक से अधिक पेय पदार्थ का इस्तेमाल करने, धूप की सीधी किरणों से बचने की सलाह भी दी है।

हमीदिया के बाल एवं शिशु रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश टिक्कस ने बताया, मौजूदा मौसम में तेज धूप और बढ़ती गर्मी के कारण बच्चों में लू के हल्के लक्षणों के साथ उल्टी, दस्त और बुखार का कॉ्म्बीनेशन देखने को मिल रहा है। पिछले 5 से 7 दिनों में ऐसे मामले बढ़े हैं।

हमीदिया में रोज पहुंच रहे 50 बच्चे:

हमीदिया अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 150 से अधिक बच्चे इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें से करीब 50 से अधिक बच्चे उल्टी-दस्त (गैस्ट्रोएंटेराइटिस) से पीडि़त हैं। पिछले एक सप्ताह से ऐसे मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

डायरिया पूरी तरह ठीक होने में 48 से 72 घंटे तक का समय लग सकता है

डॉ. राजेश टिक्कस ने सलाह दी कि बच्चों को डब्ल्यूएचओ मानक वाला ओआरएस घोल पिलाना चाहिए। इसके अलावा स्तनपान कराने वाली माताएं बच्चों को दूध देना जारी रखें। साथ ही नारियल पानी, चावल का माड़, पतली खिचड़ी, दलिया और शिकंजी जैसे तरल पदार्थ भी फायदेमंद हैं। उल्टी-दस्त पूरी तरह ठीक होने में 48 से 72 घंटे तक का समय लग सकता है।

एम्स भोपाल ने पहली बार एबीओ-इनक्पैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट किया

इधर एम्स भोपाल ने पहली बार एबीओ-इनक्पैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया है। इस जटिल प्रक्रिया में अलग-अलग ब्लड ग्रुप के बावजूद पिता ने अपने बेटे को किडनी दान कर नई जिंदगी दी। इस सफलता के बाद अब ऐसे मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी, जिन्हें ब्लड ग्रुप मैच न होने के कारण ट्रांसप्लांट में दिक्कत आती थी। यह तकनीक न सिर्फ डोनर की उपलब्धता बढ़ाएगी, बल्कि मरीजों का इंतजार भी कम करेगी। इस ट्रांसप्लांट में 47 वर्षीय पिता (एबी पॉजिटिव) ने अपने 22 वर्षीय पुत्र (ए पॉजिटिव) को किडनी डोनेट की। सामान्य तौर पर अलग ब्लड ग्रुप होने पर शरीर नई किडनी को स्वीकार नहीं करता, लेकिन आधुनिक तकनीकों और विशेष इलाज पद्धति से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया गया।