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नहीं तो लुप्त हो जाएगी बघेली लोककला

शहरीकरण और अपने के देश-विदेशों में बस जाने के कारण लोग बघेलखंड की लोक कलाओं से दूर होते जा रहे हैं, वहीं शासकीय संरक्षण नहीं मिलने से यह लुप्त होने की कगार पर है...।

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Manish Gite

Oct 05, 2015

The Baghelkhand folk art in crisis

The Baghelkhand folk art in crisis

(मध्यप्रदेश में बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड, मालवा और निमाड़ चार अलग-अलग जनपदीय सांस्कृतिक धाराएं हैं। इस बार हम बात कर रहे हैं बघेलखंड की। यह संस्कृति भी अब लुप्त होती जा रही है। )

विवेक दत्त मिश्र
भोपाल। रीवा-सतना जिले में ही वहीं के लोगों ने बघेलखंड की लोक कला को जीवित रखा है। यहां परम्परा के मुताबिक पीढ़ियों से चलाई जा रही है। शहरीकरण और अपने के देश-विदेशों में बस जाने के कारण लोग इससे दूर होते जा रहे हैं। सरकार की तरफ से भी बेहतर मदद नहीं मिलने के कारण यह अस्तित्व को बचाने के लिए छटपटा रही है।


बघेलखंड की लोक कलाओं पर शोध कर रहे नीरज कुंदेर बताते हैं कि बघेलखंड में करीब 55 लोक कलाएं अब तक बची हुई है। जिसमें श्रव्य कलाओं में गद्य और पद्य हैं। गद्य में लोक संगीत, लोक प्रथा, लोक वार्ता, लोकोक्तियां, मुहावरे, पहेली और पद्य में लोक गीत, लोक गाथा आदि शामिल हैं।


मंच नहीं मिलेगा तो लुप्त हो जाएगी
नीरज कहते हैं कि भोपाल के भारत भवन आदि स्थानों पर एक मंच मिल जाने से यह कला चंद लोगों तक पहुंच रही है, अन्यथा ज्यादा दिन दूर नहीं जब यह कला लुप्त हो जाएगी। इस कला के जानकारों का भी मानना है कि यदि इस कला को संरक्षण नहीं दिया जाता तो जल्द ही यह कला बघेलखंड में भी लुप्त हो जाएगी।


वीर से लेकर प्रेम गाथाएं है बघेली में


बघेली के लोक गीत में संस्कार गीत, ऋतु गीत, क्रिया गीत, अनुष्ठानिक गीत, खेत गीत आज भी गाए जाते हैं। इसके अलावा पौराणिक गाथा, प्रेम गाथा व वीर गाथा भी बुजुर्ग आने वाली पीढ़ी को बताते हैं। इसके अलावा लोक नृत्य, लोक नाट्य, भूमि भित्त चित्र, अंग चित्र शामिल भी परंपरा के मुताबिक बनाए जाते हैं। सामाजिक परिवेश में बघेली के लोक नृत्य धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं।


जन्म से लेकर मृत्यु तक


बच्चे के जन्म, मुडंन, कान छेदन के समय सोहर नामक लोकगीत गाया जता है। इसके अलावा समय-समय पर तीज त्योहारों पर बरूआ, भीखी आदि गीत गाए जाते है। विवाह के समय 29 प्रकार के वर पक्ष एवं 27 प्रकार के गाने कन्या पक्ष गाता है। इसमें विवाह, बनरा, गारी, अजूरी, परछन, कलेवा, मंत्री पूजन, माटी मांगल्य आदि के बोल सुनाई पड़ते हैं।


इसके अलावा ऋतुओ का आगमन के दौरान कजरी, हिदुली, संबनियां, झूला, गीत गाये जाते हैं। वहीं वर्षा, कृषि, बारहमास, फगुआ, चैती, देवी, भैरव, सन्यासी आदि गीत भी गाए जाते है। गेहू बीनते वक्त, पूड़ी बेलने और जेतवा चलते हुये और खेल के दौरान भी लोक गीत गाने की परंपरा चली आ रही है। हिन्दू समाज में जन्म से लेकर मृत्यृ तक सोलह संस्कार निभाने के साथ ही लोक गीत आज भी गाए जाते हैं।


आयोजन तक सिमिटी लोककला


बघेलखंड में जब कोई बड़ा आयोजन होता है, तब इस कला की सभी को याद आती है। इसके साथ ही इन कलाकारों की पूछ-परख शुरू हो जाती है। करमा, शैला, गुदुम, अहिराई, अहिराई लाठी, कोलदहका गायन और नृत्य के बाद इन्हें भुला दिया जाता है। अक्सर राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर इनकी प्रस्तुति शासकीय स्तर पर होती है।