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आरक्षण संशोधन विधेयक: राज्यपाल के सचिव को जारी नोटिस पर हाईकोर्ट की रोक, पढ़िए पूरी खबर

Reservation Amendment Bill: राज्य सरकार की याचिका पर हाईकोर्ट ने राजभवन सचिव को दिया था नोटिस

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आरक्षण संशोधन विधेयक: राज्यपाल के सचिव को जारी नोटिस पर हाईकोर्ट की रोक, पढ़िए पूरी खबर

Reservation Amendment Bill: आरक्षण संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर न करने के मामले में राज्यपाल के सचिव को जारी नोटिस पर हाईकोर्ट ने शुक्रवार को रोक लगा दी। सचिवालय की ओर से अंतरिम आवेदन प्रस्तुत कर नोटिस और राज्यपाल सचिवालय को पक्षकार बनाने को अवैधानिक ठहराया गया था। गुरुवार को जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने इस पर फैसला सुरक्षित किया था।

आरक्षण संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर न होने को लेकर राज्य शासन की याचिका पर हाईकोर्ट ने 6 फरवरी को राज्यपाल सचिव को नोटिस जारी किया था। राज्यपाल सचिवालय ने नोटिस वापस लेने के लिए अंतरिम आवेदन (रिकॉल एप्लिकेशन) कोर्ट में प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान राज्यपाल के सचिव की ओर से पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बी गोपाकुमार ने दलील दी कि संविधान में उल्लेखित अनुच्छेद 200 के अनुरूप विधानसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं, रोक सकते हैं या विचार के लिए आरक्षित रख सकते है। राज्यपाल के प्रतिनिधि के रूप में सचिव को भी इस आशय का नोटिस जारी नहीं किया जा सकता है।

संविधान के प्रावधान, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन बताया
राज्यपाल के सचिव की ओर से आवेदन में यह भी कहा गया कि संविधान के आर्टिकल 361 के तहत राष्ट्रपति व राज्यपाल अपने कार्यालयों की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। राज्यपाल को किसी मामले में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। राज्यपाल को जारी नोटिस वापस लेने संबन्धी सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी वकील ने प्रस्तुत किए। शुक्रवार को जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने आरक्षण संशोधन विधेयक मामले में राज्यपाल सचिवालय को पूर्व में जारी अपने नोटिस पर स्टे दे दिया।

यह तर्क लेकर सरकार गई थी कोर्ट
छत्तीसगढ़ सरकार ने लगभग दो महीने पहले, दिसंबर में विधानसभा के विशेष सत्र में राज्य के विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा दिया था। नए आरक्षण संशोधन विधेयक के अनुसार छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के लिए 32 फीसदी, ओबीसी के लिए 27 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 13 फीसदी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 4 फीसदी आरक्षण कर दिया गया था। राज्य सरकार ने नियमानुसार उक्त विधेयक को राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा था। राज्यपाल ने इसे स्वीकृत न कर उसे अपने पास रखा है। राज्यपाल द्वारा विधेयक स्वीकृत नहीं करने पर राज्य शासन और एक वकील ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाओं में कहा गया कि राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी भी बिल को रोके रखने का अधिकार नहीं है। पूरे प्रकरण पर अगली सुनवाई 24 फरवरी को निर्धारित है।

हाईकोर्ट में राजभवन के खिलाफ पैरवी किए जाने पर राज्यपाल के सचिव ने मुख्य सचिव को पत्र लिखा है। इसमें राज्यपाल की नाराजगी का भी जिक्र है। पत्र में लिखा गया है, 58 प्रतिशत आरक्षण के संबंध में उच्चतम न्यायालय में कुल 11 रिट याचिकाएं प्रस्तुत की गई हैं, जिस पर निर्णय आना अभी शेष है और ऐसी स्थिति में राज्य शासन द्वारा उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत करना देश की संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना एवं अपमान करने के बराबर भी है। उल्लेखित परिस्थितियों में राज्यपाल ने राज्य शासन एवं राज्य के महाधिवक्ता के विरुद्ध घोर अप्रसन्नता व्यक्त की है। साथ ही इस संबंध में मुख्य सचिव से जवाब भी मांगा है।

इधर, सीएम बोले-भाजपा के हाथों में राजभवन खेल रहा
आरक्षण मुद्दे पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बार फिर भाजपा के जरिए राजभवन पर हमला बोला। राजधानी में पत्रकारों से चर्चा करते हुए सीएम ने कहा, मैं राज्यपाल का व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान करता हूं। वो मेरी बड़ी बहन की तरह हैं, लेकिन यहां राज्य के लोगों और खास कर नौजवानों की हितों की बात है, क्योंकि आरक्षण का लाभ तो इन्हें ही मिलना है। भाजपा के हाथों में राजभवन खेल रहा है। यह दुर्भाग्यजनक है।