
seven elephants were killed together in odisha
रामकृष्ण पाठक/बिलासपुर. खरसिया से धर्मजयगढ़ जाते हुए, बेहरामार, हाटी क्षेत्र में पहुंचते ही दूर-दूर तक धान की पकी लेकिन रौंदी हुई फसल नजर आती है। साथ ही नजर आते हैं अपनी साल भर की मेहनत को इस तरह मिट्टी में मिलते हुए देखकर भरी आंखों से अपनी व्यथा बताते हुए किसान। हाथियों का खौफ इस इलाके में इस कदर है कि ग्रामीण फसल की रक्षा के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। मचान बनाकर रतजगा, कई जगहों पर पेड़ों को ही काट दिया गया ताकि हाथियों की गतिविधियां पहले से दिख जाएं।
धरना-आंदोलन, हाथियों से सीधे मुकाबले की तैयारी सब कुछ। लेकिन इस आतंक से मुक्ति नहीं मिल रही। वन विभाग और शासन की ओर से सावधान, हाथी विचरण क्षेत्र के बोर्ड लगा दिए गए हैं लेकिन हाथियों को रोक पाने में या फिर उनकी गतिविधियों से ग्रामीणों और फसल को बचाने के लिए कोई पुख्ता उपाय नहीं है। इस चुनाव में हाथी भी धर्मजयगढ़ क्षेत्र में बड़ा मुद्दा बने हुए हैं।
खरसिया से धर्मजयगढ़ जाते हुए जैसे ही हम बोकरामुड़ा, कुड़ेकेला से आगे बढ़े, हाथी प्रभावित इलाका शुरू हो गया। यह वही इलाका है जहां हाल ही में हाथियों ने कई लोगों की जान ली है। हमें यह पता चलता है कि हाथियों का झुंड अब भी आसपास है। हम कामना करते हैं कि कहीं उनसे सामना न हो जाए।
जैसे ही बेहरामाड़ इलाके में पहुंचे, अचानक ही दोनों तरफ के तरफ के खेतों में फसल जमीन पर बिछी नजर आई। ऐसा लगा जैसे किसी ने फसल पर बुलडोजर चला दिया हो। हम रुके और खेतों में उतरे तो खेत की गीली मिट्टी पर हाथियों के बड़े-बड़े पैरों के निशान गडढ़ों की तरह दिखे और साथ ही आसपास कुछ किसान जो अपने खेत में उतर कर नुकसान को देखकर माथा पकड़ लेते हैं। पता चला कि कुछ देर पहले ही यहां से 25-30 हाथियों का झुंड गुजरा है।
हमेशा जान का खतरा
हाथी इस सीजन में चार-पांच लोगों की जान ले चुका है। एक युवक तो सडक़ पर अपनी बाइक से जाते हुए ही उनके क्रोध का शिकार हो गया। खेत में काम करते हुए, मवेशी चराते हुए और इस सडक़ से गुजरते हुए लोग हमेशा ही खतरा महसूस करते हैं कि क्या पता किधर से हाथियों का झुंड आ धमके और वे उनके बीच फंस जाएं।
आंदोलन कर चुके, पेड़ों की कटाई भी
इस क्षेत्र के रहवासी हाथियों से सुरक्षा दिलाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर चुके हैं। सडक़ किनारे की घनी झाडिय़ों और कई पेड़ों को भी गुस्से में काट दिया ताकि हाथी दूर से नजर आ जाएं। गांव वालों में इतना गुस्सा है कि वे तीर-कमान लेकर हाथियों से भिडऩे की तक बात करने लगे हैं।
आंखों में नमी बनकर बरसती है बेबसी
खेत में उतरकर अपनी मेहनत और पेट भरने के इंतजाम को इस तरह बर्बाद होते देखना किसानों के लिए बहुत ही दर्दनाक है। किसान जगमता की आंखों में यह बताते हुए बेबसी और नमी उतर आती है कि डेढ़ एकड़ खेत की फसल लगभग चौपट कर गए हाथी। वे कहते हैं- यह रोज का किस्सा है बाबू, आए दिन कहीं न कहीं इसी तरह फसल रौंदकर हाथी निकल जाते हैं। वहीं बकरी चरा रहे बसिर साय राठिया कहते हैं कि बहुत बर्बादी है। न हम चैन से हैं, न हमारी फसल न मवेशी।
Published on:
11 Nov 2018 07:39 pm
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