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पितर पक्ष में जान लीजिए बिलासपुर की सियासत के पितरों की राजनीतिक शैली की कहानी

जो पितर की भूमिका निभाते हुए शहर की तरक्की के लिए

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Political leaders of Bilaspur's politics

पितर पक्ष में जान लीजिए बिलासपुर की सियासत के पितरों की राजनीतिक शैली की कहानी

सतीश यादव
बिलासपुर. जिस तरह से किसी परिवार के बड़े बुजुर्ग पितरों की भूमिका में होते हैं और परिवार को जीते जी आगे बढ़ाने के साथ ही न रहने पर भी पितर के तौर पर याद किए जाते हैं, उसी तरह से हर शहर के कई जनप्रतिनिधि भी ऐसे होते हैं जो पितर की भूमिका निभाते हुए शहर की तरक्की के लिए काम कर जाते हैं। उनके न रहने पर भी जनता उनको याद करती है। पत्रिका ने भी इसी तरह के कुछ पितृ पुरुषों को याद किया।
श्रीधर मिश्रा को पसंद नहीं था तामझाम
डॉ. श्रीधर मिश्रा मध्यप्रदेश शासनकाल में मंत्री रहे। शहर में पले-बढ़े मिश्रा आम लोगों से घुल-मिलकर रहा करते थे। चुनाव के समय तो वे सुबह वार्डों में पैदल ही प्रचार के लिए निकल जाया करते थे। वे ज्यादा तामझाम पसंद नहीं करते थे। उनका व्यवहार चुनाव के पहले जैसा रहता, चुनाव जीतने के बाद भी वैसा ही रहता। वे लोगों से उसी अंदाज में मिला करते थे, जैसा कि चुनाव के पहले। शहर में रहते तो प्रतिदिन लोगों से मिला करते थे। उनकी लोकप्रियता की यह एक बड़ी वजह थी। इससे उन्हें चुनाव के समय बहुत अधिक मेहनत करने की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। वे प्रचार-प्रसार के लिए शहर के नागरिकों के घरों की दीवारों को खराब करने के खिलाफ थे।
साइकिल पर निकलते थे चित्रकांत जायसवाल
चित्रकांत जायसवाल मध्यप्रदेश शासनकाल में मंत्री रहे। चुनाव प्रचार के समय वे सुबह घर से साइकिल पर निकलते थे। प्रचार के लिए जिस गांव जाना होता, वहां के रास्ते पर कार्यकर्ता घोड़े पर सवार होकर उनका इंतजार करते थे। कहीं पुल-पुलिया पड़ती, उसमें पानी अधिक होने पर वे नदी पार करके पैदल चुनाव प्रचार करने पहुंचते थे। उस समय घर-घर जाने की उतनी जरूरत भी नहीं पड़ती थी। गांव की गुड़ी-चौपाल में सभा बुलाकर प्रचार किया जाता था। गांव के किसी गौटिए के घर कार्यकर्ताओं के दोपहर का भोजन बना करता था। नेताजी घर से चना-मुर्रा और गुड़ लेकर निकलते थे। गांव में बिही, सीताफल और पीने के लिए दूध मिल जाता था। प्रचार के दौरान लोग उनसे खेती किसानी की बात करते थे, और उनकी मांग भी इसी से जुड़ी रहती थी।
सुबह 6 बजे शहर में निकल जाया करते थे पिंगले
महापौर अशोक पिंगले एेसे महापौर थे जो सुबह ६ बजे ही अपने घर से निकल जाते थे। किसी मोहल्ले में किसी घर के सामने नाली की सफाई कराने के लिए खुद खड़े हो जाया करते थे। वार्ड के पार्षदों को पता नहीं रहता था कि महापौर उनके वार्ड का निरीक्षण करके और सफाई कर्मियों को निर्देशित करके चले गए। बाद में वार्ड के लोग बताते थे, तब पार्षदों को पता चलता था। पिंगले की कार्यप्रणाली ही अलग थी। वे सुबह १०.३० बजे कार्यालय पहुंच जाते और अक्सर शाम को शहर किसी चौक-चौराहे पर नागरिकों के साथ गपशप करते नजर आते।
हर दिन जनता की समस्याओं का समाधान, इसलिए बिना प्रचार चुनाव जीत जाते थे शुक्ल
पितृ पुरुष नेताओं में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल का नाम क्षेत्र में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनकी खासियत ये कि वे हर दिन लोगों की समस्याएं सुनते, और तुरत फुरत निराकरण भी कर दिया करते थे। कोई अफसर या कर्मचारी कभी उनके मौखिक निर्देश भी नहीं टाल पाता था। यही वजह थी कि वे क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय रहे, और लंबे समय तक कोटा क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करते रहे। वे ऐसे राजनेता थे, जो बिना प्रचार के भी चुनाव जीत जाया करते थे। वे अक्सर मिलिट्री की एक जीप का उपयोग किया करते थे। चुनाव के समय दूरस्थ अंचल के गावों में प्रचार के लिए साइकिल वाले कार्यकर्ताओं की अलग से टीम बना दिया करते थे। टीम के सदस्य गांवों में जाकर प्रचार-प्रसार करते, और क्षेत्र के लोगों की समस्याएं, मांगें सुनकर बताते। इधर पंडित शुक्ल हर दिन इसकी समीक्षा व निराकरण करते। वे सभा में किसी बड़े नेता को भी नहीं बुलाते थे।
समाज के हर वर्ग से मिलते थे बीआर यादव
बीआर यादव भी मध्यप्रदेश शासनकाल में मंत्री रहे। वे हर चौक चौराहों पर अपनी बात रखते थे, लोगों की बातों को सुना करते थे। सुबह की जगह शाम को प्रचार प्रसार के लिए निकलते थे। पार्टी के कार्यकर्ता हर घर मं पम्पलेट बांटा करते थे। बीआर यादव जरूरत पडऩे पर स्कूटर या गाड़ी का उपयोग करते। चुनाव प्रचार के समय उनके साथ १० से २० लोग होते थे। वे सभी समाज के प्रमुख लोगों से मेल मुलाकात करते थे।