
ग्रामीण संस्कृति को जीवित कर रही रजवार भित्ति, मिली सराहना
बिलासपुर . रजवार भित्ति चित्र छत्तीसगढ़ी संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली एक पारंपरिक कला है। जिसका प्रशिक्षण आकार शिविर में दिया जा रहा है। इसमें ग्रामीण परिवेश की कल्पनाओं को प्लाइवुड में मिट्टी व नारियल के रस्सी का इस्तेमाल कर आकार दे रहे हैं। इस कला के माध्यम से युवतियां व महिलाएं अलग-अलग तरह की कल्पनाओं को आकार देने में जुटी हुई हैं।
छत्तीसढ़ संस्कृति विभाग के सहयोग से बिलासा कला मंच की ओर से आयोजित दस दिवसीय आकार शिविर में प्रतिभाओं को निखारा जा रहा है। कार्यशाला में पारंपरिक शिल्प कला का प्रसार किया जा रहा है, ताकि अपनी संस्कृति व सभ्यता से जुड़े हुए कला के विषय में जान सकें और उसे समझ सकें। बिलासा कला मंच के संयोजक डॉ. सोमनाथ यादव ने बताया कि शिल्प कला प्रारंभ में घर के सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाता था। जिसे महिलाएं बनाया करती थी लेकिन कहीं न कहीं समय के साथ कला से लोग दूर हो रहे थे। कला से जोड़े रखने के उद्देश्य से यह कार्यशाला आयोजित की गई है। जिसमें खास तौर पर पारंपरिक शिल्प कला के कलागुरु प्रशिक्षण दे रहे है।
इन कलाओं का भी दिया जा रहा प्रशिक्षण : आकार शिविर में चित्रकला, वारली, पैरा आर्ट, कथक, क्ले आर्ट, म्यूरल आर्ट, जूट आर्ट, मृदा शिल्प, गोंदना का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिसमें लगभग 350 से अधिक लोग प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए शामिल हो रहे हैं। पेंटिंग्स को लेकर महिलाओं में ज्यादा उत्साह देखा जा रहा है। वे इसकी बारीकियां को सीखने में अधिक समय दे रही हैं।
रजवार भित्ति चित्र कला है खास : रजवार भित्ति चित्र कला के माध्यम से प्रकृति व ग्रामीण परिवेश को दर्शाया जा रहा है। जिसमें अपनी कल्पनाओं को कलागुरु के सहयोग से आकार दे रहे है। इसमें प्लाइवुड, पोस्टर कलर, मोची किला, नारियल रस्सी, मिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही इसे बड़ी मेहनत से प्रशिक्षार्थी तैयार कर रहे हंै।
Published on:
23 May 2018 02:17 pm
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