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ख़तम हो रही घरो में बड़ी बनाने का ट्रेंड, बाजार में बिक रहे महंगे दामों पर

ऐमज़ॉन और बिगबास्केट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर 700 से 800 रूपए किलो के हिसाब से ऑनलाइन बिक रही है।

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बिलासपुर - बरसात लगने से पहले ही गर्मियों के दौरान ही घर में बरसात के लिए सब्जीयो के लिए तयारी कर ली जाती थी। लेकिन आज हमारा किचन पूरी तरह से बाजार पर निर्भर हो गया है। जिसकी जैसी आमदनी वह उस हिसाब से सब्जिया खा रहा है। बरसात के दिनों में महंगे दामों में बिकने वाले सब्जियों से बचने के लिए घर की सभी महिलाए मिल कर किसम किसम की बड़ी जैसे रखिा बड़ी, ननकी बड़ी, लाई बड़ी, बिजौरी बड़ी, लौकी बड़ी आदि और पापड़, चिप्स जैसे खाद्य पदार्थ बनाने की तयारियो में जुट जाती थी। लेकिन मौजूदा समय में यह प्रथा कही विलुप्त होती दिख रही है। कभी हमारे घरो में बनाए जाने वाली बड़ी आज ऐमज़ॉन और बिगबास्केट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर 700 से 800 रूपए किलो के हिसाब से ऑनलाइन बिक रही है।

बरसात के दिनों में सब्जियों का जल्दी सड़ जाना एक आम बात है। बरसात के दिनों में लोकल सब्जियों की पैदावार कम हो जाती है जिससे डिमांड एंड सप्लाई का बैलेंस गड़बड़ाने लगता है। इसके चलते ज्यादातर सब्जिया बहार से मंगवानी पड़ती है। बरसात के दिनों में अधिक डिमांड के चलते परिवहन के लिए वाहनों की भी समस्या रहती है। इसका नतीजा ये होता है की बरसात की शुरुआत के साथ ही सब्जियों के दाम आसमान छूने लगते है। आज के समय में बिलासपुर में टमाटर 80 रूपए, करेला 70 रूपए किलो तक बिक रहे है।

न्यूक्लियर फॅमिली के चलते
कोणी की रहने वाली दीपा दुबे बताती है कि शहरी परिदृश्य में देखा जाए तो फॅमिली में फॅमिली मेंबर्स की घटती संख्या के चलते बरसात पूर्व की तयारियो में गिरावट आया है। जॉइंट फॅमिली में महिलाए बड़ी बनाने का काम बांट कर सारी तयारिया कर लेती थी। लेकिन मौजूदा समय में शहरी एरिया में फॅमिली टूटते जा रही है जिसका फल स्वरुप घर में त्यार किए जाने वाले बड़ी आज घरो से गायब होते जा रहे है।

पारिवारिक बॉन्डिंग होती थी मजबूत
बताती है कि बड़ी बनान घरो में सब्जियों का विकल्प त्यार करने से काफी बढ़ कर था। तब हम एक परिवार के तौर पर घर की साडी महिलाए मिल कर इसे एक मिशन के रूप में देखती थी। सभी एक साथ मिलकर काम करते थे कोई रखिये कसने का काम करता था कोई उसे धोने का। सब मिलजुल कर बड़ी बनाते थे इससे हमरी दोस्ती गहरी होती थी। यह एक तरह के पर्व के सामान हुआ करता था जहा घर की छोटी से लेकर बड़ी तक सभी महिलाए मिल कर आपस में बाते साझा करती थी .

ले चूका है व्यवसाय का रूप
आज जब घरो में बड़ी बनाने की प्रथा लगभग विलुप्ति के कगार पर है ऐसे में शहर की कई ऐसी महिलाए है जो इसे एक बिजनेस के अवसर के रूप में देखती है। आज शहर के सी-मार्ट में स्व सहायता समूह की महिलाओ के द्वारा बडियो को पैक कर बेंचा जा रहा है। इसके अलावा लोकल लेवल पर भी महिलाए इसे बना कर बेच रही है और अच्छा मुनाफा बना रही है।

घटते बढ़ते दामों का सीधा असर
सब्जियों की अलटरनेट व्यवस्था न होने के चलते इसका सीधा असर आम शहरी के रसोइयों पर देखने को मिल रहा है। मंगलवार तक मिले भाव के हिसाब से बाजार में टमाटर 80, गोभी 80, करेला 80, मिर्ची 80, हरी धनिया 100, मूनगा 80, तरोई 40, भिंडी 40, देस कांदा 80, बैगन 40, गवर फल्ली 60, बरबट्टी 80 रूपए किलो तक बिक रहे है।

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