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‘राम-शबरी का प्रेम, जाति और पंथ की सभी बाधाओं से भी ऊपर’ : आचार्य गोविंद

शबरी एक भीलनी थीं। उनका स्थान प्रमुख रामभक्तों में है। वनवास के समय राम-लक्ष्मण ने शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया था और उनके द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए जूठे बेर खाए थे।

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भगवान राम व माता सबरी के प्रसंग पर आचार्य गोविंद का कहना है कि उन्हें रामायण का यह प्रसंग बहुत आकर्षित करता है। यह क्षण प्रेम जाति और पंथ की सभी बाधाओं से ऊपर है। शबरी एक भीलनी थीं। उनका स्थान प्रमुख रामभक्तों में है। वनवास के समय राम-लक्ष्मण ने शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया था और उनके द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए जूठे बेर खाए थे।

आचार्य गोविंद दुबे ने बताया कि भगवान राम छत्तीसगढ़ की पावन धरा में अपने वनवास का दिन काट रहे थे। यह शिवरीनारायण की जगह थी, जहां भगवान राम जूठे बेर खाए थे। इस समय भगवान राम, शबरी से प्रसन्न होकर उसे परमधाम जाने का वरदान दिया था। रामायण की यह घटना आज भी प्रासंगिक है। यह बताती है कि दिव्य प्रेम जाति और पंथ की सभी बाधाओं से ऊपर है। और यह मूलमंत्र हम सभी को ध्यान में रखना चाहिए। यह घटना मेरे हृदय के अत्यंत निकट है।


आचार्य दुबे ने रामायण की एक और चित्रण को याद करते हुए कहा कि भगवान राम को एक विनम्र और दयालु राजा के रूप में दिखाया गया है, जो सभी के साथ सम्मान और दया का व्यवहार करता है। वह कभी भी अपनी शक्ति या स्थिति का प्रदर्शन नहीं करता है और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है। अपनी प्रजा और यहां तक कि अपने शत्रुओं के साथ भी बातचीत करने के तरीके में उसकी विनम्रता देखी जाती है। वह अपने गुरु वशिष्ठ के प्रति आदरपूर्ण है।


क्षमा करने की शक्ति को सिखाता है रामायण
आचार्य दुबे ने बताया कि रामायण हमें क्षमा की शक्ति सिखाती है। जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था, तो राम अपने भाई लक्ष्मण को सीता को अकेला छोड़ने के लिए क्षमा कर देते हैं और फिर सीता को बचाने के लिए जाते हैं। इसी तरह, जब रावण मारा जाता है, तो राम उसे उसके कुकर्मों के लिए क्षमा कर देते हैं व सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार करते हैं। इस तरह से आचार्य दुबे बताते हैं कि क्षमा करना दुर्बलता की निशानी नहीं बल्कि शक्ति की निशानी है। यह हमें अपने क्रोध और आक्रोश को दूर करने और अपने जीवन के साथ आगे बढ़ने की अनुमति देता है। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं, तो हम न केवल स्वयं को नकारात्मक भावनाओं से मुक्त करते हैं। बल्कि अपने चारों ओर एक सकारात्मक वातावरण भी निर्मित करते हैं।

राम की सेना वफादार मित्रों-सहयोगियों से बनी

आचार्य दुबे बताते हैं कि रामायण हमें वफादारी का महत्व सिखाती है। जब हम रामायण पढ़ते हैं, तो देखते और समझते हैं कि भगवान राम की सेना वफादार मित्रों और सहयोगियों से बनी है, जो उनके लिए लड़ने व हर संभव मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहती है। यहां तक कि मरने के लिए तैयार थे। हनुमान,भगवान राम के सबसे वफादार सहयोगियों में से एक हैं। वह रावण से सीता को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह पाठ हमें सच्ची मित्रता के मूल्य और हमारे प्रति वफादार रहने के महत्व की याद दिलाता है।