
Baby Care After Delivery: Baby Care After birth: Baby Care:
Baby Care After Delivery: baby care After birth: Baby Care: जन्म के बाद का पहला हफ्ता नवजात के लिए खास होता है। इस दौरान उसका खयाल रखकर शिशुु मृत्युदर को कम किया जा सकता है। भारत में हर साल सैंकड़ों बच्चों की मौत जन्म के पहले माह में हो जाती है। इसके कई कारण हैं जैसे संक्रमण, गर्भ में या जन्म के बाद भी शिशु को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलना, समयपूर्व जन्म, शरीर का असामान्य तापमान या जन्म के समय शारीरिक-मानसिक विकृति आदि। ऐसे में प्रसव के बाद शिशु को मां का स्पर्श मिलना बेहद जरूरी है।
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सामान्य वजन -
जन्म के समय नवजात का वजन करीब 2.5 से 3.5 किलो होता है। कुछ बच्चों में शुरुआती 7 दिनों में वजन घट सकता है लेकिन 10 दिन में सामान्य भी हो जाता है।
सामान्य लंबाई, तापमान -
जन्म के समय नवजात की आर्दश लंबाई 50 सेंटीमीटर होती है। शरीर का ताममान 37 डिग्री होता है।
सर्दी में हो ऐसी केयर-
सर्दी के मौसम में नवजात की नाक जाम हो जाती है जिसे परिजन जुकाम होना समझ बैठते हैं। लेकिन ऐसा रात की सर्द हवाओं और दिन के गर्म तापमान के शरीर पर प्रभाव से होता है। ऐसे में विशेषज्ञ सेलाइन नेजल ड्रॉप नाक में डालने के लिए कहते हैं जो केवल नमक का पानी होता है। इससे नाक की सफाई हो जाती है और बच्चा सामान्य रूप से सांस लेने लगता है। इस स्थिति में नाक में देसी घी या तेल की बूंद न डालें। यदि नाक के जाम होने के साथ बच्चे को बुखार व खांसी की दिक्कत हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। इसके अलावा सर्दी के मौसम में यदि बच्चे का जन्म हुआ हो तो हफ्ते में एक बार नहला सकते हैं। या फिर गुनगुने पानी में भीगे सूती कपड़े से पूरे शरीर को पोंछ दें।
गर्भावस्था के दौरान -
मां-बच्चे को रोगों से दूर रखने के लिए महिला का टीकाकरण जरूरी है। महिला को खून की कमी पूरी करने और ब्लड प्रेशर को सामान्य रखने के साथ संक्रमण से दूर रहने के लिए हिदायत दी जाती है ताकि दोनों स्वस्थ रह सकें।
कब तक : शुरुआती और अंतिम तीन माह अहम हैं। इस दौरान ज्यादा वजन उठाने से बचें। खानपान का विशेष ख्याल रखें। साथ ही तनाव न लें।
कैसे : खानपान में हरी-सब्जियां व मौसमी फल शामिल करें। शरीर में पानी की कमी न होने दें। संक्रमण से बचने के लिए पानी को उबालें व गुनगुना ही पीएं।
प्रसव के समय -
इस समय सावधानी न बरतने से तीन प्रमुख रोगों की आशंका बढ़ती है- हाइपोथर्मिया, हाइपोग्लाइसीमिया और सेप्टीसीमिया।
हाइपोथर्मिया : जन्म के समय बच्चे के शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है। कई बार पैदा होते ही स्पेशल केयर के लिए अलग रखने पर शरीर का तापमान अचानक घटता है। जिससे वह कोल्ड स्ट्रेस में चला जाता है। यह हाइपोथर्मिया स्थिति है। इससे दिमाग सुस्त होता है जिससे उसके दूध पीने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
हाइपोग्लाइसीमिया : हाइपोथर्मिया के कारण शिशु के हार्मोन्स अनियंत्रित जाते हैं। जिससे उसका ब्लड शुगर लेवल कम हो जाता है।
सेप्टीसीमिया : हाइपोथर्मिया बच्चे की इम्युनिटी बेहद कम कर देता है। इससे संक्रमण का खतरा अन्य बच्चों के मुकाबले बढ़ जाता है।
ये करें : जन्म के तुरंत बाद गर्भनाल काटने से पहले बच्चे का मां की त्वचा से संपर्क बनाएं। मां का शरीर बॉडी टेम्प्रेचर को सामान्य रखेगा।
डिलीवरी के बाद -
प्रसव बाद बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान दें। जैसे पहले 24 घंटे में बच्चा 6-7 बार यूरिन करे, 10 दिन में उसका वजन 200-400 ग्राम हो, गर्भनाल पर बंधी क्लिप 7-10 दिन में खुद हट जाए। यदि इसपर सूजन, लालिमा, फुंसी-फोड़ा हो, पस या पदार्थ निकले तो सलाह लें।
ध्यान रखें :
शिशु को गोद में लेने से पूर्व हाथ साबुन से धुले हों। गर्दन-सिर को हाथ से सपोर्ट दें।
बच्चे की त्वचा पर आटे से लोई न करें। इससे एलर्जी की दिक्कत हो सकती है।
अगले गर्भधारण के लिए दो साल गैप रखें।
Published on:
05 Jul 2019 04:35 pm
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