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132 वर्षों से देशवासियों के भरोसे को कायम रखना ही डाबर इंडिया का लक्ष्य- सफलता- चुनौती: रोहित प्रकाश

देश की सबसे पुरानी विज्ञान आधारित आयुर्वेद कंपनी की सफलता के राज़ से लेकर उसके आयुर्वेद क्षेत्र में बढ़ते कदम सहित विभिन्न पहलुओं पर राजस्थान पत्रिका डॉट कॉम ने मार्केटिंग सर्विसेज़ हेड रोहित प्रकाश गुप्ता से ख़ास बातचीत की।

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Nakul Devarshi

Dec 06, 2016

डाबर इंडिया 132 सालों से देशवासियों के दिलों में विभिन्न प्रोडक्ट्स के माध्यम से पैठ बनाए हुए है। अब इसी भरोसे को बरकरार रखना ही डाबर का सबसे बड़ा लक्ष्य, सबसे बड़ी सफलता और सबसे बड़ी चुनौती कहा जा सकता है। ये कहना है देश की सबसे बड़ी आयुर्वेदिक हैल्थकेयर कंपनी डाबर इंडिया लिमिटेड के मार्केटिंग सर्विसेज़ हेड रोहित प्रकाश गुप्ता का। देश की सबसे पुरानी विज्ञान आधारित आयुर्वेद कंपनी की सफलता के राज़ से लेकर उसके आयुर्वेद क्षेत्र में बढ़ते कदम सहित विभिन्न पहलुओं पर राजस्थान पत्रिका डॉट कॉम ने उनसे ख़ास बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल:डाबर इंडिया वर्षों से भारतीय उपभोक्ताओं के भरोसे में खरा उतर रहा है। चाहे वो च्यवनप्राश हो या फिर लाल दन्त मंजन। आखिर क्या मानते है कंपनी के प्रोडक्ट्स की यूएसपी ?

रोहित प्रकाश: डाबर ब्रांड के तमाम प्रोडक्ट्स विज्ञान आधारित रहते हैं। कंपनी की आर एंड डी शाखा खासतौर से हर प्रोडक्ट को बाज़ार में लाने से पहले पूरी तरह से उसका विभिन्न आधारों पर परीक्षण करती है। साईंटिफिक क्लिनिकल टेस्टिंग के बाद ही उत्पादों को उपभोक्ताओं के लिए लॉन्च किया जाता है। उपभोक्ताओं को इससे मिलने वाले वास्तविक नतीजे ही वो यूएसपी कही जा सकती है जो सालों से लोगों के विश्वास पर खरी उतरी है और भविष्य में भी उतरती रहेगी। इसके साथ ही उपभोक्ताओं को विश्वसनीय और स्वास्थ्यवर्धक आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स उपलब्ध कराने के संकल्प के साथ काम करना भी डाबर की सफलता में अहम भूमिका निभा रहा है।

सवाल: भागमभाग भरी ज़िन्दगी और मॉडर्न लाइफस्टाइल के दौर में एलोपेथी पद्धति की ओर लोगों का रुझान ज़्यादा ही देखने को मिल रहा है। आपको क्या लगता है इस बीच आयुर्वेद और उससे सम्बंधित प्रोडक्ट्स की क्या स्थिति है?

रोहित प्रकाश: देखिये इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में आयुर्वेद की तुलना में एलोपेथी दवाओं का इस्तेमाल ज़्यादा है, लेकिन ऐसा मानना भी सही नहीं है कि आयुर्वेद की भूमिका बिल्कुल ही ख़त्म हो गई है। ऐसे में आयुर्वेद दवाओं और प्रोडक्ट्स के क्षेत्र में काम कर रहे उत्पादकों का एक तरह से ये ज़िम्मेदारी बन गई है कि आयुर्वेद और उसके प्रोडक्ट्स के फायदों को आम उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाए। मौजूदा स्थिति ये है कि अब लोगों में आयुर्वेद के प्रति भरोसा बढ़ने लगा है और बाज़ार में इसके प्रोडक्ट्स की मांग भी बढ़ने लगी है।

सवाल: आयुर्वेद प्रोडक्ट्स बनाने के पीछे आखिर डाबर इंडिया का क्या फोकस रहता है?

रोहित प्रकाश: डाबर के प्रोडक्ट्स विभिन्न आयु वर्गों को ध्यान में रखते हुए बाज़ार में उतारे जाते हैं। फिलहाल कंपनी का ज़्यादातर फोकस खासतौर से युवा वर्ग पर केंद्रित रहता है जिन्हें आयुर्वेद और उसके प्रोडक्ट्स के बारे में नतीजे आधारित 'प्रूफ' देने की ज़रुरत रहती है। इस कवायद में डाबर शुरू से अब तक सफल रही है।

सवाल: जानना चाहेंगे कि कंपनी के ऐसे कौन से आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स हैं जो टॉप कर रहे हैं?

रोहित प्रकाश: डाबर के ऐसे कई प्रोडक्स्ट हैं जिनका नाम ही काफी है। डाबर का च्यवनप्राश और लाल दन्त मंजन उनमे से एक हैं। इनके अलावा हाजमोला की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री ही बता देती है कि लोगों में ये कितनी पसंद की जा रही है। डाबर टूथपेस्ट तो इस कैटेगरी में तीसरे नंबर का ब्रांड बना हुआ है। इसी तरह से पुदीन हरा और हनीटस भी काफी पसंद किया जा रहा है।

सवाल: आयुर्वेद प्रोडक्ट्स बनाने में जड़ीबूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। आखिर कहां-कहां इन जड़ीबूटियों की पैदावार हो रही है? क्या डाबर की ओर से इसी सिलसिले में किसी तरह की फार्मिंग भी हो रही है?

रोहित प्रकाश: डाबर ने उत्तराखंड के पंत नगर और नेपाल में अत्याधुनिक ग्रीन हाउस स्थापित किये हुए हैं। यहां कई तरह की दुर्लभ जड़ी-बूटियों को उगाया जा रहा है। डाबर के ग्रीनहाउस में विकसित उच्च कोटि की प्लांटिंग सामग्री खेती के लिए किसानों को दी जाती है और बाद में कंपनी के साथ किये गए समझौते के तहत वापस ले ली जाती है। कंपनी का आर एंड डी डिपार्टमेंट विलुप्त होने की कगार में बन रही जड़ीबूटियों को बचाये रखने की मुहीम में जुटा हुआ है।

सवाल: डाबर को इस क्षेत्र में काम करते हुए कई साल हो गए हैं, ज़ाहिर है तब से अब तक इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा में भी काफी कुछ बदलाव देखने को मिले हैं, मार्केट में बने रहने और लोगों का विश्वास बनाये रखने के लिए किस तरह सेडाबर की मार्केटिंग स्ट्रेटर्जी काम करती है?

रोहित प्रकाश: डाबर इस क्षेत्र सौ सालों से भी ज़्यादा समय से है, ज़ाहिर है उसने अब तक के दरम्यान हुए बदलावों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा को बेहद करीब से देखा है। लिहाज़ा उसी के अनुरूप मार्केटिंग स्ट्रेटर्जी बनती और बदलती रहती है। दरअसल, डाबर प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप से लेता है। वैसे कहें कि अभी आयुर्वेदिक हेल्थकेयर 'बच्चा' है जिसको अभी बहुत बड़ा होना है, तो ये कहना गलत नहीं होगा। दूसरी कंपनियां इस क्षेत्र में आ रहीं हैं और यहां निवेश बढ़ रहा है, इनसे आखिरकार इस क्षेत्र को पनपाने में ही मदद मिल रही है जो डाबर का मुख्य मकसद है।

सवाल: डाबर इंडिया राजस्थान में किस तरह से काम कर रहा है? क्या कुछ प्रोजेक्ट्स पर यहां काम हो रहा है?

रोहित प्रकाश: डाबर इंडिया के लिए राजस्थान दरअसल, 'प्रायोरिटी 1' की श्रेणी में आता है, लिहाज़ा इस प्रदेश में कंपनी का विशेष फोकस रहता है। कंपनी ने यहां अलवर और टोंक के निवाई में प्रोजेक्ट्स की स्थापना की है। आने वाले दिनों में भी यहां नए प्लांट्स लगाकर निवेश करने की योजना बनाई जा सकती है।

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