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इंफोसिस में ऑफिस बॉय की नौकरी की, अब हैं दो स्टार्टअप्स के CEO, PM मोदी कर चुके हैं तारीफ

Success Story: शार्क टैंक सीजन-3 में दादासाहब भगत ने boAt के को-फाउंडर अमन गुप्ता से 1 करोड़ का निवेश 10% इक्विटी के लिए हासिल किया।

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एक छोटे से गांव से उठकर Canva जैसी कंपनी खड़ी कर दी (PC: Instagram)

सच्ची लगन हो और कुछ करने की जिद हो तो, मुश्किलें भी रास्ता देती हैं। तमाम चुनौतियों से लड़ते हुए अपने लिए एक अलग मुकाम बनाने वाले दादासाहब भगत की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो जिंदगी में कुछ हासिल करना चाहते हैं। महाराष्ट्र के बीड जिले में एक छोटे से गांव में रहने वाले दादासाहब भगत की ये कहानी संघर्षों से भरी है। कभी वो देश की दिग्गज IT कंपनी इंफोसिस में ऑफिस बॉय की नौकरी करते थे, लेकिन आज अपनी ही खड़ी हुई कंपनियों के CEO हैं।

10वीं तक पढ़ाई, लेकिन सपने बड़े

एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए दादासाहेब की पढ़ाई लिखाई सिर्फ 10वीं तक ही हो पाई। अपने परिवार को सपोर्ट करने के लिए वो पुणे आ गए और उन्होंने इंफोसिस के गेस्ट हाउस में एक ऑफिस बॉय की नौकरी कर ली। लोगों को चाय पिलाना, साफ-सफाई, रूम सर्विस यही उनका काम था और सैलरी थी सिर्फ 9 हजार रुपये। लेकिन उनकी मंजिल ये नहीं थी, वो तो कुछ बड़ा करने के लिए पुणे आए थे।

इंफोसिस में वो लोगों को कंप्यूटर पर काम करते देखते, यहीं से उनकी दिलचस्पी टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर की दुनिया में बढ़ी. जबकि 10वीं पास करने के बाद उन्होंने ITI से एक डिप्लोमा कोर्स किया था, इसके अलावा उनके पास टेक्नोलॉजी को लेकर कोई जानकारी नहीं थी. फिर भी उन्होंने कोई इंडस्ट्रियल जॉब न करके एक आईटी कंपनी को चुना। भगत कॉरपोरेट की दुनिया को देखकर काफी उत्साहित थे, लेकिन वो जानते थे कि कॉलेज डिग्री नहीं होने से कॉरपोरेट की दुनिया में आगे बढ़ना उनके लिए मुश्किल होगा।

दिन में काम, रात में एनिमेशन की पढ़ाई

मगर, भगत ने अपनी पढ़ाई को अपनी महत्वाकांक्षाओं के आड़े नहीं आने दिया। उनके मन में एनिमेशन और डिजाइन सीखने को लेकर जबरदस्त इच्छा पैदा हुई। इसलिए उन्होंने एक एनिमेशन क्लास को ज्वाइन कर लिया। अब वो दिन में ऑफिस बॉय का काम करते, शाम को एनिमेशन की क्लास करते। इस समर्पण का फल मिला और उन्हें मुंबई में एक जॉब मिली, फिर बाद में वो ज्यादा अच्छी नौकरी की तलाश में हैदराबाद चले गए। हैदराबाद में भगत ने पाइथन और C++ जैसी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज में गहराई से काम किया, जिसने उनकी भविष्य की कामयाबी के लिए रास्ता तैयार किया। इस दौरान उन्होंने देखा कि ढेर सारे विजुअल इफेक्ट्स बनाने में काफी ज्यादा वक्त लगता है। अगर एक लाइब्रेरी बना दी जाए, जिसमें बार-बार इस्तेमाल किए जाने वाले टेम्पलेट्स हों, तो ये मुश्किल आसान हो सकती है। उन्होंने अपने इस आइडिया पर काम शुरू किया और कई डिजाइन बनाकर ऑनलाइन बेचना शुरू कर दिया।

पहली कंपनी बनाई Ninthmotion

मगर जिस वक्त भगत भविष्य की योजनाओं में गहराई से डूबे हुए थे, तभी वो एक कार हादसे का शिकार हो गए, लेकिन वो तब भी डिगे नहीं। उन्होंने अपनी सारी ताकत अपने काम में लगा दी। साल 2015 में उन्होंने अपने पहली कंपनी नाइंथमोशन (Ninthmotion) की शुरुआत की। उनकी ये कंपनी ग्लोबल क्लाइंट्स को डिजाइन सर्विसेज देती थी। उनके क्लाइंट्स की लिस्ट में BBC स्टूडियोज और 9XM म्यूजिक चैनल जैसे बड़े नाम शामिल थे, जो ये बताने के लिए काफी थे कि उनकी मेहनत रंग ला रही है।

दूसरी कंपनी बनाई DooGraphics

भगत ने Canva की तरह ही ऑनलाइन ग्राफिक डिजाइन के लिए एक वेबसाइट बनाने की सोची। उन्होंने DooGraphics नाम से एक दूसरी कंपनी की शुरुआत की। ये यूजर्स को बहुत आसान तरीके से ग्राफिक्स डिजाइन बनाने का प्लेटफॉर्म थी। इसमें यूजर्स ड्रैड एंड ड्रॉप करके बड़ी आसानी से टेम्पलेट और डिजाइन बना सकते हैं। मगर, तभी कोविड आया और पूरे देश में लॉकडाउन लग गया। भगत के लिए बड़ा झटका था। पुणे में उन्हें अपना ये काम बंद करना पड़ा और वो वापस अपने गांव बीड लौट गए।

लेकिन भगत रुके नहीं, उन्होंने गांव में एक गोशाला को टीन की शेड और 4G नेटवर्क की व्यवस्था करके एक क्रिएटिव हब में बदल दिया। अपने कुछ दोस्तों को साथ में लिया, उन्हें एनिमेशन और डिजाइन की ट्रेनिंग दी और एक टीम बनाकर काम करने लगे। 6 महीने बाद ही DooGraphics के पास 10,000 से ज्यादा क्लाइंट्स थे। जो कि ज्यादातर दिल्ली, महाराष्ट्र, बेंगलुरु से थे। कुछ क्लाइंट्स जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूके से भी थे।

PM मोदी ने की तारीफ, शार्क टैंक में एंट्री

दादासाहब की कामयाबी अब सबकी नजर में थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2020 में अपने मन की बात कार्यक्रम में उनकी सफलता का जिक्र किया।

शार्क टैंक सीजन-3 में दादासाहब भगत ने boAt के को-फाउंडर अमन गुप्ता से 1 करोड़ का निवेश 10% इक्विटी के लिए हासिल किया। इस हिसाब से कंपनी की वैल्युएशन तब करीब 10 करोड़ रुपये बैठती है। कंपनी अभी भले ही छोटी है, मगर तेजी से ग्रोथ कर रही है। इसे इंडिया का Canva कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

दादासाहब भगत की सफलता उनके कड़े संकल्प, परिश्रम का नतीजा है। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से उठकर कैसे एक युवा लड़के ने उस फील्ड में अपनी पहचान बनाई, जिसकी न तो उसने कभी पढ़ाई की और न ही कभी उससे वास्ता पड़ा। मगर जब करने की ठानी तो करने के ही माना।