
सरकार ने यह राहत ट्रांसपोर्ट अलाउंस में दी है। Patrika
अगर आप शेयर मार्केट में सीधे इन्वेस्ट करने का जोखिम नहीं उठा सकते, तो म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं। म्यूचुअल फंड में एकमुश्त या एसआईपी के जरिए निवेश किया जा सकता है। एसआईपी में हर महीने एक तय राशि निवेश करनी होती है। भारत में म्यूचुअल फंड एक लोकप्रिय निवेश विकल्प है। म्यूचुअल फंड हाउसेस निवेशकों के पैसों को मैनेज करने के लिए फंड मैनेजर नियुक्त करते हैं। साथ ही फाइनेशियल एनालिस्ट्स की एक टीम होती है। ऐसे में म्यूचुअल फंड में निवेश पर निवेशकों से कई तरह के चार्जेज लिये जाते हैं। ये चार्जेज आपके रिटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि ये चार्जेज कौन-कौन से हैं।
फंड मैनेजरों को स्कीम के मैनेजमेंट के लिए पेमेंट किये जाते हैं। यह पैसा निवेशकों से मैनेजमेंट फीस के रूप में वसूला जाता है। इसे एक्सपेंस रेश्यो के रूप में भी जानते हैं।
अगर निवेशक न्यूनतम बैलेंस रखने की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते, तो एसेट मैनेजमेंट कंपनियां उनसे अकाउंट फीस वसूलती हैं। यह फीस निवेशक के पोर्टफोलियो से डायरेक्ट काट ली जाती है।
जब निवेशक म्यूचुअल फंड यूनिट खरीदता है, तो फंड हाउस निवेशक से एंट्री लोड वसूलता है। इक्विटी म्यूचुअल फंड पर एंट्री लोड नहीं लगता है।
जब इन्वेस्टर म्यूचुअल फंड यूनिट्स को बेचता है या रिडीम करवाता है, तो एसेट मैनेजमेंट कंपनी इन्वेस्टर से एग्जिट लोड लेती है। यह अलग-अलग स्कीम में अलग-अलग हो सकता है। आमतौर पर यह 0.25 फीसदी से 4 फीसदी तक होता है।
कई फंड हाउसेज निवेशकों को एक म्यूचुअल फंड स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने की सुविधा देते हैं। जब आप इस सुविधा का फायदा उठाते हैं, तो आपसे स्विच फीस वसूली जाती है।
एसेट मैनेजमेंट कंपनी प्रिंटिंग, मेलिंग और मार्केटिंग जैसे खर्चों को पूरा करने के लिए निवेशकों से सर्विस और डिस्ट्रीब्यूशन चार्जेज वसूलती हैं।
Published on:
02 Jul 2025 05:26 pm
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