आइआइटी मद्रास और तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया विकसित
चेन्नई.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आइआइटी मद्रास) और तेल अवीव विश्वविद्यालय इजराइल के शोधकर्ताओं ने एक एरोजेल अवशोषक का विकास किया है जो गंदे पानी के अत्यंत सूक्ष्म प्रदूषक दूर कर सकता है। यह ग्राफीन मोडिफाइड सिलिका एरोजेल लगातार बहते हुए पानी से भी 76 प्रतिशत से अधिक अत्यंत सूक्ष्म प्रदूषक (पीपीएम स्तर) दूर कर भारी मात्रा में पानी साफ करने का सस्टेनेबल उपाय हो सकता है। शोधकर्ताओं की टीम बड़े पैमाने इसके उपयोग के लिए शोध के परिणाम और बेहतर करने में लगी है। एरोजेल अत्यंत हल्के वजन के ठोस पदार्थ हैं। इनमें अधिकांश हवा होती है। ये उत्कृष्ट अवशोषक प्रदूषक मुक्त करने वाले ठोस पदार्थ का काम करते हैं। इसमें कई लाभ हैं जैसे सर्फेस कैमिस्ट्री बदलने की क्षमता, घनत्व कम होना और अत्यधिक छिद्र होना। इन्हें अक्सर 'ठोस हवा' या 'जमा हुआ धुआं' भी कहते हैं और ये आसानी से बनाए जा सकते हैं।भारत में दुनिया का केवल 4 प्रतिशत जल संसाधन है जबकि इसी से भारत में रहने वाली दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करना है। खास कर फार्मास्यूटिकल्स और वस्त्र उद्योग में जहां पानी की बहुत खपत है यह चुनौती अधिक गंभीर है। इसलिए जल प्रदूषण दूर करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। सिर्फ वस्त्र उद्योग में सालाना लगभग दस लाख टन जहरीले सिंथेटिक रंग उत्सर्जित होते हैं, जो जलीय जीवन और पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा है।
यह शोध आइआइटी मद्रास के शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार विजेता प्रोफेसर रजनीश कुमार के मार्गदर्शन में किया गया और इसमें केमिकल इंजीनियरिंग विभाग आइआइटी मद्रास के शोध विद्वान सुभाष कुमार शर्मा और पी रंजनी और स्कूल ऑफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग तेल अवीव विश्वविद्यालय इजराइल के प्रोफेसर हदास ममने शामिल थे। शोध के निष्कर्ष हाल ही में प्रसिद्ध पत्रिका नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में बतौर शोध पत्र प्रकाशित किए गए।इस तरह के शोध को अहम बताते हुए आइआइटी मद्रास के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के रजनीश कुमार ने कहा गंदे पानी को साफ करने की स्वदेशी तकनीक न केवल प्रदूषण बल्कि पानी की गुणवता सुरक्षित रखने, पारिस्थितिकी की रक्षा करने और प्रदूषित पानी संबंधी खतरे कम करने के लिए भी आवश्यक है।