
चेन्नई. गल्फ ऑफ मन्नार के वान द्वीप पर एक दशक से चल रही कृत्रिम रीफ बहाली परियोजना ने सामाजिक और पारिस्थितिक लाभों का नया अध्याय लिखा है। तमिलनाडु तटीय पुनर्स्थापन मिशन, सुगंथि देवदासन मरीन रिसर्च फाउंडेशन और आइआइटी मद्रास के तकनीकी आकलन के अनुसार इस परियोजना से 61.67 करोड़ रुपए का लाभ प्राप्त हुआ है जो इसकी महंगाई समायोजित लागत से दोगुना है।वान द्वीप जो 21 निर्जन प्रवाल द्वीपों में से एक है, 1969 से 2015 के बीच 92 प्रतिशत तक सिकुड़ गया था। क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर से घटकर मात्र 1.53 हेक्टेयर रह गया था। प्रवाल खनन, समुद्र स्तर वृद्धि और रीफ क्षरण इसके कारण बने। इस संकट को रोकने के लिए 2015 से वैज्ञानिकों ने 10,600 विशेष कृत्रिम रीफ मॉड्यूल लगाए। परिणामस्वरूप द्वीप का क्षेत्रफल बढ़कर 2.3 हेक्टेयर से अधिक हो गया।
रीफ मॉड्यूल पर औसतन 81 प्रवाल कॉलोनियां विकसित
रीफ मॉड्यूल पर औसतन 81 प्रवाल कॉलोनियां विकसित हुईं और मछलियों की संख्या आठ गुना बढ़ी। प्रवाल से जुड़ी मछलियों का घनत्व 106 से बढ़कर 875 प्रति हेक्टेयर हो गया। साथ ही 26 देशी पौधों की प्रजातियां संरक्षित हुईं। आर्थिक मूल्यांकन में पाया गया कि तटीय सुरक्षा सबसे बड़ा लाभ है जिसका मूल्य 28.57 करोड़ रुपए आंका गया। अवसादन नियंत्रण और पोषक चक्र जैसी पारिस्थितिक सेवाओं का मूल्य 13 करोड़ रुपए रहा जबकि मत्स्य और अन्य लाभ 13.43 करोड़ रुपए के रहे।
तटीय पुनर्स्थापन को बढ़ाने का आधार
परियोजना की महंगाई समायोजित लागत 26.37 करोड़ रुपए रही जबकि शुद्ध वर्तमान मूल्य 35.3 करोड़ रुपए दर्ज किया गया। अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने कहा कि यह आकलन “पारिस्थितिक लाभों को आर्थिक प्रमाण में बदलता है” और तटीय पुनर्स्थापन को बढ़ाने का आधार प्रदान करता है। शोधकर्ताओं ने वान मॉडल को अन्य 20 क्षरणग्रस्त द्वीपों की रक्षा के लिए एक रूपरेखा बताया। राज्य ने करीयाचल्ली द्वीप के लिए 50 करोड़ रुपए की बहाली परियोजना आरंभ की है जहां कृत्रिम रीफ की स्थापना शीघ्र पूरी होगी। यह परियोजना सिद्ध करती है कि गंभीर तटीय क्षति को रोका जा सकता है और प्रकृति आधारित उपाय आर्थिक व पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से लाभकारी हैं।
Updated on:
23 Feb 2026, 8:02 PM IST
Published on:
23 Feb 2026, 8:01 PM IST
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