जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ब्लड सेपरेशन यूनिट ने अब तक हजारों मरीजों को लाभ पहुंचाया है। इस यूनिट के द्वारा रक्त के विभिन्न घटकों को अलग-अलग करके मरीजों को सही समय पर इलाज दिया जा रहा है।
छतरपुर. जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ब्लड सेपरेशन यूनिट ने अब तक हजारों मरीजों को लाभ पहुंचाया है। इस यूनिट के द्वारा रक्त के विभिन्न घटकों को अलग-अलग करके मरीजों को सही समय पर इलाज दिया जा रहा है। खासकर थैलेसीमिया और गंभीर बीमारियों से ग्रसित बच्चों को इसका बड़ा लाभ हो रहा है, जिससे उन्हें अब ग्वालियर और झांसी जैसे शहरों के बड़े अस्पतालों में नहीं जाना पड़ता। इस यूनिट की शुरुआत से पहले उन्हें वहां इलाज के लिए जाना पड़ता था, जिससे न केवल समय की बर्बादी होती थी, बल्कि खर्च भी बढ़ जाता था।
ब्लड सेपरेशन यूनिट को शुरू करने के लिए पिछले पांच साल से प्रयास किए जा रहे थे, लेकिन कई बार कागजी कार्रवाई में कमी और खामियों के कारण लाइसेंस नहीं मिल पा रहा था। हालांकि, जून 2024 में ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया से लाइसेंस मिलने के बाद यूनिट का संचालन शुरू हुआ और अब यह सुविधा जिले के लोगों को मिल रही है। पैथोलॉजी लैब प्रभारी डॉ. श्वेता गर्ग का कहना है कि इसका सबसे बड़ा फायदा थैलेसीमिया के मरीजों को हुआ है। पहले इन्हें बार-बार पूरी रक्त की आवश्यकता होती थी, लेकिन अब ब्लड सेपरेशन यूनिट की मदद से केवल रक्त के जरूरी घटक जैसे रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स अलग-अलग करके मरीजों को दिए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया से न केवल मरीजों की हालत बेहतर हो रही है, बल्कि हर महीने सैकड़ों मरीजों को इसका लाभ मिल रहा है, जिनमें डेंगू, कैंसर और सर्जरी के मरीज भी शामिल हैं।
ब्लड कंपोनेंट मशीन खून के विभिन्न तत्वों को अलग-अलग कर देती है। यह मशीन रेड ब्लड सेल्स (आरबीसी), श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी), प्लेटलेट्स, प्लाज्मा और फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (एफएफपी) को अलग करती है। उदाहरण के लिए, थैलेसीमिया के मरीजों को रेड ब्लड सेल्स, डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स, जलने के मरीजों को प्लाज्मा और एड्स के मरीजों को डब्ल्यूबीसी की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया से एक यूनिट रक्त से तीन मरीजों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।