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गिद्धों को सबसे ज्यादा लुभा रहे बकस्वाहा के जंगल, इस बार 299 पाए गए

इस वर्ष जिले में कुल 709 गिद्ध दिखे, सफेद गिद्ध सबसे ज्यादा, 2016 में मिले थे सिर्फ 247

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गणना में बकस्वाहा क्षेत्र में मिले गिद्ध

गणना में बकस्वाहा क्षेत्र में मिले गिद्ध

छतरपुर. वर्ष 2023-24 के प्रथम चरण में गिद्धों की गणना का तीन दिवसीय अभियान पूरा हो गया है। अभियान छतरपुर जिले के लिए खुशी की खबर लाया है। जिले में 709 वयस्क, अवयस्क एवं बच्चे गिद्ध पाए गए हैं। बकस्वाहा में वर्ष 2019 में 209 गिद्धों की तुलना में इस बार 299 गिद्ध देखे गए हैं। प्रकृति के सफाईकर्मियों यानि गिद्धों की बढती संख्या हमारे जिले के प्राकृतिक वातावरण की शुद्धा का प्रतीक हैं। खासतौर से बकस्वाहा के जंगल गिद्धों को सबसे ज्यादा लुभा रहे हैं।

अबतक में सबसे ज्यादा गिद्ध इस साल मिले
वर्ष 2019 में वन विभाग के 300 से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारियों ने जिले में कुल 514 गिद्ध खोजे। जिसमें 429 वस्यक और 85 अवस्यक गिद्ध शामिल थे। इनमें सबसे ज्यादा संख्या सफेद गिद्ध की रही, जो 50 व्यस्क और 230 अवस्यक थे। जिले में देशी गिद्ध , सफेद गिद्ध, राज गिद्ध, काले गिद्ध, उरेशियन गिद्ध और हिमालयन गिद्ध पाए गए। खजुराहो रेंज में 5 अवयस्क और 76 व्यस्क, छतरपुर रेंज में 2 वयस्क, बिजावर रेंज में 11 अवयस्क एंव 70 वयस्क, बाजना रेंज में 11 अवयस्क और 60 वयस्क, बड़ामलहरा रेंज में 23 अवयस्क एंव 47 वयस्क और वक्सवाहा रेंज में 43 अवस्यक और 176 वयस्क गिद्ध पाए गए है। गणना में कई साल बाद हिमालयन और उरेशियन गिद्ध नजर आए । ये प्रावसी गिद्ध बीच में जिले के जंगलों में आना बंद हो गए थे।

जलवायु के अच्छे संकेतक है गिद्ध
दुनियाभर में गिद्धों की 23 प्रजातियां पाई जाती है। इनमें से नौ प्रजातियों के गिद्ध भारत में पाए जाते हैं। भारत में पाई जाने वाली गिद्धों की नौ प्रजातियों में से सात प्रजातियां पन्ना टाइगर रिजर्व व उसके आसपास के इलाके में पाई जाती है। इनमें से चार स्थानीय प्रजातियां हैं और तीन प्रवासी टर्की कल्चर भी प्रवासी वल्चर है जो हाल में ही मप्र के शिवपुरी में देखा गया है। दा लास्ट वाइल्डरनेश फाउंडेशन के रीजनल कोआर्डिनेटर इंद्रभान सिंह बुंदेला ने बताया कि इस बार प्रवास पर आने वाले गिद्ध देर से आए हैं। गिद्धों के देर से आने अर्थ समझा जाता है कि क्षेत्र में बारिश होगी या ठंड पड़ेगी। हुआ भी ऐसा ही जिले में बारिश हुई और तेज कोहरा रहा। गिद्धों को जलवायु और पर्यावरण के अच्छे संकेतक के रूप में भी पहचाना जाता है।

रेडियो टैग गिद्धों की मॉनिटरिंग नहीं
पन्ना टाइगर रिजर्व में 25 देसी व विदेशी प्रजाति के गिद्धों को रेडियो टैग लगाए गए थे। लेकिन इन मॉनिटरिंग न होने से इन गिद्धों की वापसी की जानकारी नहीं हो पा रही है। गिद्धों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट होने के बाद भी पन्ना टाइगर रिजर्व ने मॉनिटरिंग बंद कर दी है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून की मदद से सौर उर्जा चलित रेडियो टैग लगाए गए थे, लेकिन देहरादून की टीम भी आंकड़ो का विश्लेषण नहीं कर रही है।