
चौसर की बिसात
एतिहासिक नौगांव मेले के दौरान महाभारत काल से जुड़ी प्राचीन खेल परंपरा चौसर (चौपड़) प्रतियोगिता ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। सदियों पुराने इस खेल की बिसात मेले में बिछते ही मानो इतिहास जीवंत हो उठा। प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में बुजुर्ग खिलाड़ियों ने भाग लिया और पांसे फेंककर अपनी रणनीति और अनुभव का प्रदर्शन किया।
चौसर प्रतियोगिता देखने के लिए आसपास के गांवों के साथ-साथ दूर-दराज से भी दर्शक मेले में पहुंचे। खेल के दौरान दर्शकों की भीड़ बिसात के चारों ओर जमी रही और हर चाल पर उत्सुकता बनी रही। यह प्रतियोगिता नौगांव मेले का प्रमुख आकर्षण बनी हुई है। चौसर, जिसे चौपड़ या चौपर भी कहा जाता है, भारत के सबसे प्राचीन राजशाही खेलों में शामिल है। यह खेल जमीन पर बिछाई गई विशेष बिसात पर खेला जाता है, जिसमें गोटियों और पांसों या कौड़ियों का उपयोग किया जाता है। खेल का उद्देश्य अपने मोहरों को केंद्र तक पहुंचाना होता है, जबकि प्रतिद्वंद्वी के मोहरों को बाहर करना खेल की अहम रणनीति होती है। एक मुकाबला पूरा होने में लगभग चार से पांच घंटे का समय लग जाता है, जिससे खिलाड़ियों की धैर्य और रणनीतिक क्षमता की परीक्षा होती है।
छतरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित नौगांव को ब्रिटिश काल में स्मार्ट सिटी और अंग्रेजों की राजनीतिक राजधानी के रूप में जाना जाता था। यह नगर आज भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। चौसर जैसी प्रतियोगिताएं नौगांव की इसी विरासत को जीवित रखने का कार्य कर रही हैं।
प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में खुर्दा निवासी उमा प्रसाद गौतम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया। वहीं प्रमोद रिछारिया ने उपविजेता का स्थान हासिल किया। खिलाड़ियों ने पूरे उत्साह और एकाग्रता के साथ खेल में भाग लिया। खेल प्रेमी गोविंद सिंह और विजेता उमा प्रसाद गौतम ने कहा कि चौपड़ जैसे पारंपरिक खेल हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।मेले के दौरान नौगांव में अंतरराज्यीय क्रिकेट टूर्नामेंट, कबड्डी, बास्केटबॉल सहित अन्य खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा रही हैं, लेकिन महाभारत कालीन चौसर प्रतियोगिता अपनी ऐतिहासिक पहचान और परंपरा के कारण मेले की खास पहचान बनी हुई है।
Published on:
13 Jan 2026 10:31 am
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