
छबीलदास एवं साथी महाराष्ट्र द्वारा सोंगी नृत्य,सुमन साहा एवं साथी द्वारा सती लीला नाट्य
छतरपुर. मप्र संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक गांव की वर्षगांठ पर विश्व पर्यटन स्थल खजुराहो में तीन दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत शुक्रवार होने के बाद दूसरे दिन क्षेत्रीय कलाकारों ने विशेषज्ञों द्वारा तैयार प्रस्तुतियां दीं।
29 से 31 दिसम्बर तक आयोजित होने वाले समारोह में मप्र की जनजातीय एवं लोक कलाओं की प्रस्तुतियों के साथ संक्षिप्त शिल्प मेला और व्यंजनों के स्वाद को भी परोसा जा रहा है। इस शिल्प मेले में पारम्परिक शिल्पी द्वारा रचनात्मकता का प्रदर्शन विक्रय के साथ- साथ किया गया।
आयोजन के दूसरे दिवस की संध्या पर कार्यक्रम में सर्वप्रथम जयप्रकाश पटेरिया एवं साथी द्वारा बुंदेली लोकगीत मन तैं उतईं ओरछे मेरा..., गारी गावैं जनकपुर की नारी..., गोरी गोरी गुईंयां चंदा जैसी जोत..., हरदोल चरित्र..., जैसे अनेक प्रस्तुति दी गई।
कार्यक्रम की अगली प्रस्तुति गोपाल कोरकू एवं साथी, हरदा द्वारा गदली-थापटी नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी गई। कोरकू नृत्य में अलग ही पहनावा देखने को मिलता है, पुरूष सफेद रंग पसंद करते हैं, सिर पर लाल पगड़ी पर कलंगी लगाते हैं। वहीं स्त्रियां अनेक रंगों जैसे लाल, हरी, नीली, पीली रंग की किनारी वाली साड़ी पहनती हैं। नृत्य में ढोलक की प्रमुख भूमिका होती है। ढोलक की लय और ताल पर सभी हाथों और पैरों की विभिन्न मुद्राओं को बनाते हुए गोल घेरे में नृत्य करते हैं।
तीसरी प्रस्तुति सागर से आए मनीष यादव एवं साथी के बरेदी नृत्य की प्रस्तुति दी गई। बुंदेलखंड के लोकनृत्य बरेदी का संबंध हमारे देश की कृषक चरवाहा संस्कृति के साथ है। बुंदेलखंड में बरेदी नृत्य दीपावली से पंद्रह दिन यानी पूर्णिमा तक चलते हैं। विशेष किन्तु अत्यन्त आकर्षक नृत्य पोषाक के साथ ८-१० युवक और किशोर नर्तक अत्यंत तीव्र गति के साथ नृत्य करते हैं, एक व्यक्ति नृत्य के पहले गीत गाता है। और साथी छड़ी और मोर पंखों के साथ प्रस्तुति देते है। दीपावली के अवसर पर की जाने वाली गोवर्धन पूजा से इसका घनिष्ठ संबंध है।
प्रस्तुति के अगले क्रम में छबीलदास एवं साथी, महाराष्ट्र द्वारा सौंगी मुखौटा नृत्य की प्रस्तुति हुई। सौंगी मुखौटा नृत्य महाराष्ट्र और गुजरात, बीच सीमांत गांवों में निवास करने वाले जनजातीयों का मूल नृत्य है। यह अत्यन्त आकर्षक रंग-बिरंगी वेशभूषा और हाथ में रंगीन डंडे लेकर प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य उनके देवता नृसिंह बेताल और काल भैरव के लिए प्रस्तुत किया जाता है। चैत्रमास से फाल्गुन तक इस नृत्य को किया जाता है।
इसके बाद प्रहलाद कुर्मी एवं साथी, सागर द्वारा राई नृत्य की प्रस्तुति दी गई। जिस तरीके से किसी थाली में रखे सरसों के दाने घूमते हैं, उसी तरह नर्तक भी नगडिय़ा, ढोलक, झीका और रामतूला जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर नाचते हैं। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक नृत्य राई की एक अलग ही मर्यादा रही है, ये राजा महाराजाओं के दरबारों की शान रहा है। बुंदेला और चंदेला राजाओं की खास पसंद रहा है, जिसमें लंबे घूंघट में ढकी नर्तकी की एक अपनी ही अलग नृत्यशैली रही है। जो समय के साथ बदलती जा रही है और अब इस नृत्य को बुंदेलखंड में मंचीय नृत्य की स्थिति मात्र में सीमित नहीं किया गया है। बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे के जन्म के समय और विवाह के अवसर पर राई नृत्य का आयोजन प्रतिष्ठा मूलक माना जाता है।
दूसरे दिवस की अंतिम प्रस्तुति सुमन साहा एवं साथी द्वारा सती लीला नाट्य की रही। नाटक में भगवान शिव-सती के विवाह, मिलन, श्री राम के वन गमन इत्यादि सभी दृश्यों को नृत्य व नाट्य के माध्यम से दिखाया गया। इसमें संवाद के साथ नृत्य की भी अहम भूमिका रही। साथ ही नाट्य शास्त्र की अलग-अलग विधाओं को इसमें लिया गया है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण आंगिक अभिनय है। जिसे देखने वाले दर्शकों ने खूब सराहा।
Published on:
30 Dec 2023 08:14 pm
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