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आवारा कुत्तों का बढ़ता आतंक, हर माह 400 लोग पहुंच रहे अस्पताल, नसबंदी के लिए तीसरी बार टेंडर की तैयारी

गलियों से लेकर मुख्य मार्गों तक झुंड में घूमते कुत्ते न सिर्फ राहगीरों के लिए खतरा बने हुए हैं, बल्कि बच्चों और बुजुर्गों के लिए घर से बाहर निकलना तक मुश्किल कर रहे हैं।

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आवारा कुत्तों का झुंड

शहर और जिले में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। गलियों से लेकर मुख्य मार्गों तक झुंड में घूमते कुत्ते न सिर्फ राहगीरों के लिए खतरा बने हुए हैं, बल्कि बच्चों और बुजुर्गों के लिए घर से बाहर निकलना तक मुश्किल कर रहे हैं। नगर पालिका ने भले ही कुत्तों को पकडऩे के लिए टीमों का गठन कर दिया हो, मगर कार्रवाई नाममात्र की है।

नसबंदी योजना दो साल से ठप

नगर पालिका ने कुत्तों की नसबंदी के लिए बीते दो वर्षों में दो बार टेंडर निकाले थे। लेकिन न तो कोई कंपनी और न ही कोई ठेकेदार आगे आया। लिहाजा यह प्रक्रिया बीच में ही बंद हो गई। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद अब फिर से नगर पालिका हरकत में आई है और दावा किया जा रहा है कि जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

बस्तियों में रात का सन्नाटा, लोग बदलते हैं रास्ता

सौरा रोड, देरी रोड, बजरंग नगर, विश्वनाथ कॉलोनी, चौबे कॉलोनी और अन्य दो दर्जन से ज्यादा कॉलोनियों में आवारा कुत्तों का आतंक है। हालात यह हैं कि रात में लोग जरूरी काम होने पर भी बाहर निकलने से कतराते हैं। बाइक और साइकिल सवारों के पीछे दौड़ पडऩा तो इन कुत्तों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी है। कई इलाकों में लोग इन्हें देखकर रास्ता बदलते हैं।

हर माह 400 से ज्यादा केस, डॉक्टरों के पास लंबी लाइन

जिला अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक औसतन हर माह 400 से ज्यादा लोग रेबीज का इंजेक्शन लगवाने आते हैं। इनमें ज्यादातर पीडि़त आवारा कुत्तों के हमले का शिकार होते हैं। बीते वर्ष जनवरी माह में तो एक आवारा कुत्ता 130 लोगों को काट चुका था। पन्ना नाका, बस स्टैंड और छत्रसाल चौराहे पर इस कुत्ते के आतंक से लोग घरों में कैद हो गए थे। अंतत: नपा टीम ने दो दिन की मशक्कत के बाद उसे पकड़ा था।

कानून की पेचीदगी: पालतू कुत्ते पर एफआईआर, आवारा पर खामोशी

अब तक आवारा कुत्तों पर किसी तरह का स्पष्ट कानून नहीं था। यदि पालतू कुत्ता किसी को काट ले, तो उसके मालिक पर आइपीसी की धारा 289 में एफआईआर दर्ज होती रही है। मगर आवारा कुत्ता हमला करे तो कोई कार्रवाई संभव नहीं। उलटे यदि कोई व्यक्ति आवारा कुत्ते को नुकसान पहुंचाए, तो उस पर पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मामला दर्ज हो सकता है। यानी पीडि़तों के पास मुआवजे का दावा प्रशासन से करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस कानूनी खामोशी पर पहली बार ठोस नजीर पेश करता है।

नपा के पास न रिकॉर्ड, न शेल्टर होम

नगर पालिका के पास आज तक यह रिकॉर्ड ही नहीं है कि शहर में कुल कितने आवारा कुत्ते हैं। न ही कोई शेल्टर होम उपलब्ध है जहां पकड़े गए कुत्तों को रखा जा सके। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब नगर पालिका को मजबूरन इस दिशा में कदम उठाने होंगे।

समय पर न पहुंचे तो खतरा

जिला अस्पताल की ओपीडी सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे और शाम 5 से 6 बजे तक खुलती है। इस दौरान आने वाले मरीजों को रेबीज इंजेक्शन मिल जाता है। लेकिन यदि कोई पीडि़त इन तय समय के बाद पहुंचता है, तो उसे बाजार से इंजेक्शन खरीदकर लगवाना पड़ता है। डॉ. अरविंद सिंह के मुताबिक, घटना के 24 घंटे के भीतर पहला रेबीज इंजेक्शन लगना अनिवार्य है। गंभीर घाव होने पर इनोग्लोबिन भी देना जरूरी होता है। पहले पांच इंजेक्शन दिए जाते थे, अब इन्हें घटाकर चार कर दिया गया है।

नगर पालिका का वादा: जल्द होगी कार्रवाई

सीएमओ माधुरी शर्मा का कहना है आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। दो बार टेंडर बुलाए गए थे, मगर कोई एजेंसी आगे नहीं आई। अब फिर टेंडर की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। गौरतलब है कि शहर में आवारा कुत्तों का आतंक केवल स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता की भी कहानी कहता है। हर माह सैकड़ों लोग अस्पताल की चौखट पर पहुंचते हैं, बच्चे घरों में कैद हैं, और नागरिकों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब बदलाव की उम्मीद जगाता है। सवाल यह है कि क्या नगर पालिका केवल कागजों में कार्रवाई करेगी या सचमुच इस समस्या से निपटने का ठोस कदम उठाएगी?