शिक्षा के साथ सफल जीवन में विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका
छतरपुर. शिक्षा के निजीकरण के साथ शासकीय संस्थानों से मिलने वाली शिक्षा की दशा-दिशा ही बदल गई है। जीवन में सफलता की राह दिखाने वाले विश्वविद्यालय अब केवल संस्थान बनकर रह गए हैं। ऐसे में व्यक्ति के समग्रा विकास में किस तरह से विश्वविद्यालय अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस मुद्दे को लेकर महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर शुभा तिवारी ने पत्रिका के साक्षात्कार में अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि किस तरह शिक्षा के जरिए समाज में स्थाई परिवर्तन लाया जा सकता है।
प्रश्न- शिक्षा का मुख्.य उद्देश्य क्या है? क्या शिक्षा का मुख्य उद्देश्य रोजगार पाना है?
उत्तर- समाज में स्थाई परिवर्तन शिक्षा के माध्यम से आता है। विश्वविद्यालय एक व्यक्ति को शिक्षित, जागृत और प्रशिक्षित करता है। कुछ वर्षो पहले तक एक विश्वविद्यालय से प्राप्त की गई शिक्षा अपने आप में सम्पूर्ण होती थी। शिक्षित व्यक्ति के पास डिग्री के अनुरूप योग्यता होती थी। वह सोचने की शक्ति रखता था। अपने विषयों का उसको अच्छा ज्ञान होता था। विश्वविद्यालयीन शिक्षा से उस मनुष्य का और उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता था। उसे प्राय: रोजगार भी उपलब्ध हो जाता था। शिक्षा का उद्देश्य मात्र रोजगार नहीं था और नही हो सकता है। रोजगार एक बायप्रोडक्ट है। मुख्य उद्देश्य व्यक्ति का विकास ,उसकी सोच का विकास तथा समग्र जीवन में गुणवत्ता लाना है।
प्रश्न- शिक्षा के बाजारीकरण का व्यवस्था व विद्यार्थियों पर क्या असर पड़ा है? क्या बेहतर शिक्षा के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने की होड़ का असर गांव व गरीब छात्रों पर पड़ रहा है?
उत्तर- पिछले कुछ वर्षो से हम देख रहे है कि प्रवेश के लिए विद्यार्थी विभिन्न साइबर कैफे तथा दुकानों में जाकर लाइन लगाकर अपना फार्म भरते है। वहीं से फीस भरकर अपना प्रवेश पाते है। इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी संख्या में फार्म भरने में विषयों के चयन में गलती हो जाती है, आवश्यक जानकारी भरने में गड़बड़ी हो जाती है। यहां तक की उसकी व्यक्तिगत जानकारी भरने में भी त्रुटियां हो जाती है। प्रवेश के उपरान्त विद्यार्थी शहर में स्थित विभिन्न ई-लाईब्रेरी के चक्कर काटने लगता है। जो विद्यार्थी थोड़ा भी पढ़ाई के प्रति संजीदा है वह निजी ई-लाईब्रेरी संचालकों को फीस भरकर और वहां बैठकर अपना पढ़ाई करता है। इस प्रक्रिया में हमारे गांव का गरीब विद्यार्थी कहीं अलग-थलग पड़ जाता है। उसके पास इस सुविधा हेतु देने के लिए पैसे नहीं होते। कई बार उसका निवास भी गांव में होता है। जहॉ पर संभवत: अभी तक यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। बाजार की इस पद्धति का अंत यही पर नहीं होता है। इसके आगे विद्यार्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए पुन: एक बार शहर के विभिन्न नुक्कड़ो में संचालित कोचिंग की दुकानों की तरफ बढ़ता है। वहॉ पर वह पुन: पैसे देता है। कोचिंग लेता है और नौकरी पाने का प्रयास करता है।
प्रश्न: क्या ये सही है कि विश्वविद्यालय अपनी प्रासंगिकता खोकर मात्र एक कार्यालय की भूमिका में आ गए हैं?
उत्तर: हम स्पष्ट रूप से देख सकते है कि एक विश्वविद्यालय धीरे-धीरे करके एक विद्यार्थी के वास्तविक जीवन में अपनी प्रासंगिता, अपना महत्व खो देता है। विश्वविद्यालय अपना स्थान छोड़ते चले जा रहे है। वे मात्र एक कार्यालय के रूप में टीसी, माइग्रेशन, डिग्री, मार्कशीट देने लेने तथा विभिन्न जटिल प्रक्रियाओं के केन्द्र बनते जा रहे है। एक विश्वविद्यालय को अपना स्थान पुन: ले लेना चाहिए।
प्रश्न: विश्वविद्यालयों की क्या भूमिका होनी चाहिए? विश्वविद्यालय की पढ़ाई से जीवन में क्या बदलाव आने चाहिए।
उत्तर- छात्रों का प्रवेश करवाना विश्वविद्यालय का दायित्व है। पुस्तकें और ई-पुस्तकें उपलब्ध करवाना विश्वविद्यालय का दायित्व है। शिक्षा देना, कक्षाएं संचालित करवाना, खेलकूद करवाना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में परांगत करना, रोजगारपरक कोचिंग देना ,ये सारे कार्य विश्वविद्यालय के है। एक विश्वविद्यालय को अपने दायित्व से भागना नहीं चाहिए। यह समय है कि जब एक विश्वविद्यालय अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से आत्मसात करें। एक विश्वविद्यालय यह समझे कि भारत के समाज में उसका क्या स्थान है। समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना, जागरूकता लाना, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास करना, पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत करना, स्थाई हुनर को बढ़ावा देना, स्थानीय संस्कृति, अर्थव्यवस्था और कला को समृद्ध करना, सामाजिक न्याय की अवधारणा को लोकप्रिय बनाना,ये सभी काम एक विश्वविद्यालय के है। ये सभी काम एक विश्वविद्यालय को करना चाहिए। समाज में महत्व मांगने से नहीं मिलता है। समाज में स्थान क्रेडिट मांगने से नहीं प्राप्त होती है। एक विश्वविद्यालय को चाहिए कि वे आने वाले समय का दृष्टि में रखते हुए अपने सभी दायित्वों को स्वीकार करें और उनको बखूबी निभाएं। विश्वविद्यालय जागृत होंगे तो भारत वर्ष जागृत होगा। यही शिक्षा का जादू है। हम सबको मिलकर इस काम में लग जाना चाहिए।